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Friday, 16 October 2015

इंदौर : पत्रकारिता के पापी !





मैच के पहले ...


मैच के बाद ...




दोनों खबरें अलग अलग हैं मगर अखबार एक ही है। ये महज एक खबर नहीं है, सच तो ये है कि ऐसी खबरें अखबार और संपादक का चरित्र बताती है। चलिए खबर का थोडा रेफरेंस भी बता दूं,  14 अक्टूबर को इंदौर में चार साल बाद क्रिकेट का कोई अंतर्राष्ट्रीय मैच हो रहा था, इसके टिकट के लिए काफी मारामारी थी। आलम ये था कि 11अक्टूबर यानि रविवार को बैंक से टिकट मिलने थे, लेकिन पगलाए क्रिकेटप्रेमी शनिवार को ही दोपहर से लाइन में लग गए । इन बेचारों ने पूरी रात सड़क पर काट दी, सुबह हुआ तो  भीड़ और बढ़ गई, बेचारे पुलिस की लाठियां तक खाई फिर भी टिकट के लिए जद्दोजहद करते रहे, इसके बाद भी टिकट नहीं मिला। फिर मैच के दो दिन पहले जब  इंदौर के एक बडे अखबार में पहले पेज पर खबर छपी " आखिर टिकट गए कहां " तो लोगों को लगा कि अखबार ने जिम्मेदारी निभाई और कम से कम आम जनता की बात को इस अखबार ने रखा, लेकिन मैच के दो दिन बाद दूसरी खबर छपी " वन डे की जीत ने टिकटों की मारामारी को भुला दिया "  तब सवाल उठा संपादक जी पर ! अगर हम कहें कि सिर्फ सवाल उठा तो गलत होगा, सही मायने में उंगली उठी संपादक जी पर .... ।

संपादक जी, आपकी जानकारी गलत है,  टिकटों की मारामारी को जनता ने नहीं भुला दिया, आपने भुला दिया। आपने क्यों भुला दिया, ये आप बेहतर जानते हैं, हम तो इतना जानते हैं कि आपको मैच के एक दिन पहले देर रात में पास मिल गए थे। वैसे संपादक जी आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पास तो कुछ और संपादकों को भी भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। कुछेक संपादक तो रिपोर्टर वाला पास ही गले लटकाए मुंह निपोरते हए स्टेडियम में मौजूद थे। संपादक जी, समझ में नहीं आ रहा कि  आप टिकटों की मारामारी कैसे भूल गए ?  अखबार ही ध्यान से पढ़ लीजिए तो पता चल जाएगा कि लोग भूले या नहीं । श्रीनगर से मैच देखने आए लोग इंदौर में धक्के खाते रहे टिकट नहीं मिला, वो मायूस होकर लौट गए और आप कह रहे हैं कि वो सब भूल गए ? वाराणसी से दस लोगों की टीम यहां दो दिन तक धक्के खाती रही, आखिर तक मैच नहीं देख पाए, वो भी भूल गए ? बैंक के सामने 24 घंटे से भी ज्यादा समय तक लोग लाइन में लगे और फिर भी टिकट हाथ नहीं लगा, इंदौर की वो आम जनता टिकट की मारामारी को भूल गई ? संपादक जी टिकट की मारामारी सिर्फ आप भूल गए, फिर इस बात जोर देकर कह रहा हूं कि आप ही भूल गएं । क्यों भूल गए ? इसके लिए मुझे मजबूरी में मुझे कुछ कांग्रेस नेताओं का नाम लेना पडेगा और मैं बेवजह उन्हें अपने लेख में जगह देना नहीं चाहता।

जिस तरह के हालात आपने बना दिए हैं, उससे तो मन तो होता है कि मौका है अभी ही  इंदौर की कुछ टाउनशिप की बात भी करूं, मन तो ये भी है कि तुलसीनगर के पूरे मसले को तार-तार कर दूं। कुछ और बडे बडे मामलों की चर्चा करूं,  फिर लगता है कि नहीं, उसकी चर्चा सही वक्त आने पर की जाएगी। मुझे तो इंदौर में आए सिर्फ छह महीने हुए हैं, लेकिन दिल्ली, यूपी और पूर्वोत्तर भारत की २५ साल की पत्रकारिता पर ये छह महीने का अनुभव भारी है। दिल्ली में रहने के दौरान जब कभी भी खराब राज्य की बात होती तो लोग यूपी और बिहार की ओर देखने लगते हैं,  खराब प्रशासनिक अधिकारियों की बात हो तो भी लोग यूपी और बिहार की तरफ देखते हैं,  खराब कानून व्यवस्था की बात हो फिर यूपी बिहार का जिक्र होता है। इतना ही नहीं जब पत्रकारिता में भ्रष्टाचार की बात हो तो भी यही राज्य सामने आते हैं। लेकिन इंदौर ने मेरी जानकारी में इजाफा किया है। मैं यूपी बिहार को मध्यप्रदेश के मुकाबले कई गुना बेहतर मानता हूं। वहां के अफसर कितने भी दबाव में हों लेकिन अस्पताल में घायल पड़े गरीब, लाचार मजदूर का लिवर, किडनी और आंखें नहीं निकलवा सकते, यहां के अधिकारी ने ये किया। वहां भ्रष्टाचार में बडे से बड़ा नेता मंत्री जेल जाता है, यहां व्यापम मामले में अब तक ४२ लोगों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है, फिर भी नेता अफसर सब ताल ठोंक रहे हैं। पत्रकारों की बात करें तो पाएंगे कि पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को बनाए रखने के लिए यूपी - बिहार के  पत्रकारों ने अपनी जान दे दी। आए दिन इन दोनों राज्यों से पत्रकारों की हत्या की खबरें मिलती है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वहां पत्रकारिता की आड में बेईमानी नहीं होती, पर ये दावा जरूर करूंगा कि जो कुछ यहां देखने को मिल रहा है, उसके मुकाबले वहां १० प्रतिशत भी पत्रकार बेईमान नहीं हैं।

वैसे आज सूबे की सियासत की बात छोड़ देते हैं,  आम आदमी की जान ले लेने वाले अफसर की भी बात नहीं करूंगा। आज सिर्फ अपने पेशे के भीतर झांकने की कोशिश करूंगा। यहां पत्रकारिता में भ्रष्टाचार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इंदौर से ही प्रकाशित होने वाले एक अखबार में पहले पेज पर पत्रकारों की बेईमानी की खबर इस पेज की लीड खबर बनती है। इतना ही नहीं १० दिन से ये खबर नए तथ्यों के साथ पहले पेज पर बरकरार है। हालाकि अब इन पत्रकारों के मामले में बकायदा रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है, पुलिस अपना काम कर रही है। अखबार की खबर में भी यही तथ्य हैं कि जिनके खिलाफ मामला दर्ज है या फिर जो पकडे गए हैं ये तो महज प्यादे हैं, इनका बाँस बोले तो शाकाल कोई और है। मेरे ख्याल से तो इस शाकाल को पकड़ना कम से कम मध्य प्रदेश की पुलिस के लिए ना सिर्फ मुश्किल है बल्कि नामुमकिन है। अच्छा सच तो ये है कि पुलिस जिसे शाकाल समझ रही है वो शाकाल की शक्ल में बहुरुपिए है। बडे वाले तक तो न पुलिस पहुंचने की कोशिश कर रही है और न ही पहुंचना चाहती है।




Saturday, 15 November 2014

पत्रकार हैं, रुकिए प्लीज ! खबर आपकी ...

हां अगर आप पत्रकार हैं या पत्रकार बनने जा रहे हैं तो फेसबुक का ये पेज आपके लिए ही है। दरअसल ये हमारी नई संस्था " मैं हूं ना वेलफेयर सोसाइटी " समाज सेवा के और कार्यों के साथ ही अपने पत्रकार मित्रों के लिए भी संवेदनशील है। आज महसूस किया जा रहा है कि शहरी एवं ग्रामीण अंचलों में वैतनिक और अवैतनिक पत्रकारों के साथ लगातार दिल्ली, लखनऊ के बड़े पत्रकारों के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू की जाए, जिससे पत्रकारों को लाभ होगा। इसके लिए राज्य स्तर, जिला स्तर, तहसील स्तर, शहर और ब्लाक स्तर पर पत्रकारों के लिए प्रशिक्षण और कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। इस पेज का  लिंक  ( https://www.facebook.com/profile.php? id=100006311055350 ) है। 

पत्रकार साथी अन्यथा नहीं लेगें, पर राज्य और जिला स्तर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की कार्यशाला लगाना हम बेहद जरूरी मानते है। कोशिश होगी कि इस कार्यशाला में इलेक्ट्रानिक  मीडिया के बड़े संस्थानों के संपादक और वरिष्ठ पत्रकारों को कार्यशाला में शामिल किया जाए, इस कार्यशाला के जरिए कोशिश होगी कि पत्रकारों में संवेदनशीलता के साथ ही उन्हें समाज के प्रति और जिम्मेदार तथा जवाबदेह बनाया जाए, जिससे लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ ज्यादा मजबूत हो। पत्रकारों की इच्छा होती है कि उन्हें युद्ध, नक्सली हिंसा, साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान रिपोर्टिंग की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी मिले। इसके लिए विशेषज्ञ पत्रकारों के जरिए युद्ध, हिंसा, नक्सली हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा के दौरान रिपोर्टिंग में बरती जाने वाली सावधानियों पर पत्रकारों को विशेष जानकारी देने की कोशिश की जाएगी।

अक्सर देखा गया है कि पत्रकार बनने के लिए राज्य के विश्वविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों जहां पत्रकारिता के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं, बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं प्रवेश लेते हैं, लेकिन उन्हें यहां सिर्फ किताबी ज्ञान ही मिलता है। ऐसे में जब वो पत्रकारिता में आते हैं तो काफी परेशानी होती है। इंटर्नशिप के दौरान कुछ ही बच्चों को अच्छे मीडिया संस्थान में अवसर मिल पाता है, इसलिए बाकी बच्चे पिछड़ जाते हैं। इसके लिए कोशिश होगी कि विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में खास कार्यशाला का आयोजन कर उन्हें व्यवहारिक पत्रकारिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाए।

आखिर में पत्रकारों से संबंधित एक बात और .... जिला, तहसील, ब्लाक स्तर के पत्रकारों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निराकरण के लिए ठोस प्रयास किया जाएगा। किसी तरह की दुर्घटना में घायल पत्रकारों की सहायता करने के मकसद से जरूरतमंद पत्रकारों को दुर्घटना बीमा की सुविधा मुहैया कराई जाएगी।



नोट : यदि आप पत्रकार हैं, पत्रकारिता का कोर्स कर रहे हैं या फिर पत्रकारिता में किसी तरह की रुचि रखते हैं और आपके  पास कोई सुझाव है तो आप यहां शामिल कर सकते हैं। हमारी कोशिश होगी कि हम आपके सुझाओं पर आगे बढ़ सकें। 


Tuesday, 19 November 2013

बिहार : पत्रकारों को चोर बना रहे हैं नीतीश !

बिहार के पत्रकार मित्र से बात हो रही थी, काफी दिन बाद उनसे मिलना हो रहा था, लिहाजा तय हुआ कि प्रेस क्लब में ही मिलते हैं। तय  समय पर प्रेस क्लब में पहुंच कर कुछ पीने-खाने का आर्डर दिया गया और बात घर परिवार से शुरू होकर बिहार की पत्रकारिता पर पहुंच गई। पत्रकारिता पर बात शुरू होते ही मित्र की आंखे डबडबा गईं, मैं फक्क पड़ गया। ऐसा क्या है कि मित्र की आँख में आंसू आ गया। मैने पूछा.. हुआ क्या ? इतना गंभीर क्यों हो गए ? भाई जब मित्र ने बोलना शुरू किया तो फिर एक सांस में बिहार की राजनीति को दो सौ गाली दी । कहने लगे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की पत्रकारिता को पूरी तरह दफन कर दिया है। अखबारों के मालिक विज्ञापन के लिए नीतीश के सामने घुटने टेक चुके हैं। अब नीतीश सरकार पत्रकारों को चोर बना रही है और उन्हें नगर पालिका के होर्डिंग्स आवंटित किए जा रहे हैं। ये सब सुनकर मैं तो हैरान रह गया, फिर मुझे भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू की वो टिप्पणी याद आई जो उन्होंने बिहार के लिए ही कही थी कि "बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव ही नहीं है" ।

मुझे याद है कि पांच छह महीने पहले भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैन मारकंडेय काटजू ने कहा था कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता संभव ही नहीं है, तो इस बात पर मुझे हैरानी हुई, मैने पूर्व जस्टिस काटजू के इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की थी। मैने कई जगह इस विषय पर लेख भी लिखा और काटजू साहब को कटघरे में खड़ा किया। लेकिन आज बिहार की पत्रकारिता की जो तस्वरी सामने आ रही है, वो वाकई बहुत चिंताजनक है। वहां हालत ये है कि किसी संपादक की औकात नहीं है बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ अखबार में एक भी शब्द लिख सकें। वहां एक बड़े अखबार समूह के संपादक ने बस थोड़ी कोशिश भर की थी कि उनको पटना से अखबार ने बेदखल कर दिया। हालांकि वहां संपादक को जब पता चला था कि मुख्यमंत्री नाराज हैं तो बेचारे उनसे मिलकर सफाई दे आए थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने माफ नहीं किया। अब सभी अखबार के संपादकों को पता है कि अगर बिहार में संपादक बने रहना है तो मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से पंगा नहीं लेना है।

पत्रकार मित्र ने बताया कि बीजेपी नेता नरेन्द्र मोदी ने पटना के गांधी मैदान में सभा को सबोधित करते हुए नीतीश कुमार को अहंकारी बताया था। एक अखबार के पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में ये शब्द इस्तेमाल कर दिया। बता रहे हैं कि संपादक ने उसे उल्टा टांग दिया। कहने लगे तुम्हें तो नौकरी करनी नहीं है, हमारी नौकरी के दुश्मन क्यों बन रहे हो ? आप समझ सकते हैं कि अगर किसी अखबार का संपादक ही इस कदर मुख्यमंत्री का पालतू बन चुका हो तो बाकी स्टाफ के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। इतनी बात करते-करते मित्र बिल्कुल उदास हो गए, कहने लगे बस ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि किसी तरह पटना से मुक्ति मिल जाए। बहरहाल मैने उन्हें मित्रवत सुझाव दिया कि भाई जब तक दूसरी जगह बात ना हो जाए, ऐसा वैसा कोई कदम मत उठाना।

संपादकों की बात करते-करते उन्होंने वहां के पत्रकारों के बारे में बताना शुरू किया। कहने लगे कि बिहार में जब पत्रकारों ने देखा कि उनके मालिक और संपादक ही सरकार के सामने दुम हिला रहे हैं, तो वो भला शेर क्यों बनें ? पत्रकारों ने भी शुकून से नौकरी का रास्ता अपना लिया। बता रहे हैं कि पटना में नगर पालिका ने सारे होर्डिंग्स का ठेका पत्रकारों को दे दिया है। पत्रकारों ने उनकी औकात के हिसाब से होर्डिंग्स दिए गए हैं। बड़े ग्रुप के अखबार या चैनल में हैं तो ऐसे पत्रकार को 20 से 25 होर्डिंग्स दिए गए हैं। उसके बाद 15, 10 और कुछ को पाच- सात से ही संतोष करना पड़ा है। पहले पत्रकारों को एक होर्डिंग्स के लिए सालाना 50 रुपये देने पड़ते थे। पत्रकार मित्र इस होर्डिंग्स को 15 से 25 हजार रुपये महीने में दूसरों को बेच दिया करते थे। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पिछले दिनों नगर पालिका ने होर्डिंग्स के किराए को रिवाइज किया और इसका किराया 50 रुपये सालाना से बढ़ाकर 200 रुपये सालाना कर दिया। पत्रकार लोगों ने इसे लोकतंत्र पर खतरा बताया और इस मामले को लड़ने के लिए "सुप्रीम कोर्ट" चले आए। ये अलग बात है कि कोर्ट को पता चल गया कि ये धंधेबाज पत्रकार हैं, लिहाजा कोर्ट ने राहत नहीं दी।

अच्छा पत्रकारों का ये गोरखधंधा जानकर आपको लग रहा है कि इसमें वही गली मोहल्ले छाप पत्रकार शामिल होंगे। माफ कीजिएगा ऐसा नहीं है। चलिए आप से ही एक सवाल पूछते हैं आप इलेक्ट्रानिक मीडिया में किस-किस चैनल का नाम जानते हैं ? मैं समझ गया कि आप किस - किस चैनल का नाम ले रहे हैं। राष्ट्रीय चैनल हो या फिर क्षेत्रीय,  हिंदी में हो या अंग्रेजी में, या फिर भोजपुरी में ही क्यों ना हो.. ज्यादातर चैनल के पत्रकार इस गोरखधंधे में बराबर के हिस्सेदार हैं। चैनल का नाम इसलिए पहले लिया कि आप सब जानते हैं कि टीवी चैनल के पत्रकारों का वेतन ठीक ठाक है, लेकिन बेईमानी के माल की बात ही कुछ और होती  है । चैनल का जब ये हाल है तो अखबारों के पत्रकार किस स्तर पर होर्डिंग्स के लिए मारा मारी कर रहे होंग, ये आसानी से समझा जा सकता है। वैसे वहां से छपने वाले अखबारों के पत्रकारों की ज्यादा मौज है, बाहर से आने वाले अखबार की कुछ कम है, लेकिन चोरी में वो भी शामिल हैं।

ऐसी ही शिकायत मिलने पर भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू ने बिहार की पत्रकारिता पर तीखा बयान देने के साथ ही तीन पत्रकारों की एक कमेटी बनाई और पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। बताते हैं कि पत्रकारों की ही कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना असंभव है। इस टीम ने नीतीश सरकार की तुलना आपातकाल से की है। कहा जा रहा है कि इमरजेंसी के दौरान स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जिस तरह सेंसरशिप लगी हुई थी, वही स्थिति इस समय नीतीश सरकार के कार्यकाल में भी है। आज बिहार में ज्यादातर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं। विज्ञापन के लालच में मीडिया संस्थानों को राज्य सरकार ने बुरी तरह अपने चंगुल में जकड़ रखा है। हालत ये है कि पत्रकार स्वतंत्र और निषपक्ष खबर लिख नहीं पा रहे हैं। बहरहाल प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने सुझाव दिया है कि विज्ञापन देने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए जो विज्ञापन जारी करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो, पर नीतीश इस सुझाव को भला क्यों मानेंगे ? अब समझ गए ना यही है नीतीश के सुशासन का असली और बदबूदार चेहरा !



Friday, 1 March 2013

मीडिया के मास्टर माइंड का सच !


इलेक्ट्रानिक मीडिया का बचकाना काम देखकर कई दफा हैरानी होती है। आप सब जानते हैं कि इस वक्त संसद का सबसे महत्वपूर्ण यानि बजट सत्र चल रहा है। संसद में रेल और आम बजट पेश किया जा चुका है और अब इस पर चर्चा शुरू होगी। लेकिन बजट के पहले मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया का हुडदंग देखने लायक होता है। मैं तो पांच-सात साल से देख रहा हूं कि बजट सत्र के पहले चैनल के बड़े दम खम भरने वाले जर्नलिस्ट ट्रेन पर सवार हो जाते हैं और वो सीधे बाथरूम को कैमरे पर दिखाते हुए साफ सफाई को लेकर रेल मंत्रालय को कोसते हैं, जो ज्यादा उत्साही पत्रकार होता है वो ट्रेन के खाने की बात करते हुए घटिया खाने की शिकायत करता है और उम्मीद करता है शायद इस बजट में रेलमंत्री का ध्यान इस ओर जाएगा। अच्छा आम बजट के पहले भी इसी तरह की एक घिसी पिटी कवायद शुरू होती है, चैनल की अच्छी दिखने वाली लड़की को किसी बडे आदमी के घर के किचन में भेज दिया जाता है। पांच तोले सोने की जेवरों से लदी उस घर की महिला वित्तमंत्री को समझाने की कोशिश करती है कि घर चलाना कितना मुश्किल हो गया है। सच तो ये है कि जिस घर में महिला पत्रकार जाती है, उस महिला को आटे चावल का सही सही दाम तक पता नहीं होता है।

हां आप सवाल पूछ सकते हैं कि आखिर गरीबों के यहां या फिर झोपड़ पट्टी में पत्रकार  जाकर खाने की थाली पर रिसर्च क्यों नहीं करते ? मैं कहूंगा कि आपने बहुत अच्छा सवाल किया है, पर चैनल खासतौर पर हिंदी चैनल मध्यम वर्गीय परिवार में देखा जाता है, गरीबों के यहां किचन तो होता नहीं है, वही चूल्हे में फूंक  मारती महिला से बात करनी पड़ेगी जो इतनी सारी समस्या गिना देगी कि उतना सब दिखाने का समय भी चैनल के पास नहीं है। अच्छा ये काम कोई ऐसा वैसा चैनल करे तो बात समझ में आती है, मुश्किल तो तब होती है जब खुद को नंबर एक कहने वाला चैनल ये काम करता है। अब देखिए ना " आज तक "  ने अपने 10 महिला पत्रकारों को रेल बजट से पहले ट्रेन की यात्रा कराई, उनसे कहा गया कि ट्रेन के सफर के दौरान होने वाली मुश्किलों को बताएं। अब चैनल के मास्टर माइंड को कौन समझाए कि ट्रेनों में होने वाली दिक्कतें तो आप कभी भी उठा सकते हैं, इसके लिए बजट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। संपादक जी अगर आज रेलवे स्टेशन पर गंदगी है, ट्रेनों में गंदगी है तो इंतजार करेंगे कि बजट के पहले ये स्टोरी की जाएगी। उसी समय, उसी दिन क्यों नहीं ? मजेदार तो ये कि शाम को इसी चैनल ने इतने फूहड़ तरीके से रेल बजट पर रिपोर्ट प्रसारित की माथा ठनक गया। शीर्षक सुनेंगे " छुपा कर क्यों बढाया रे " । अब इस दिमागी दिवालिएपन को आखिर क्या कहा जाए ? अरे भाई बजट में लुका छिपा क्या है, बजट की कापी तो संसद में पेश की गई है, इतना ही पत्रकारों के हाथ में भी वही बजट है। अब आपको समझ में ही देर से आया तो इसके लिए क्या किया जा सकता है।

सच कहूं तो चैनल के मास्टर माइंड कहे जाने वाले लोगों को बजट की एबीसीडी ही नहीं पता है। वरना वो सवाल उठाते कि पिछले बजट मे जो कुछ ऐलान किया गया था, वो अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ ? अगर पिछले बजट में घोषित सभी ट्रेनें पटरी पर अभी तक नहीं आईं तो नई ट्रेन का ऐलान क्यों किया जा रहा है ? अच्छा एक बहुत गलत फहमी है पत्रकारों को कि ये बजट रेलमंत्री का होता है, अरे भाई अगर बजट पर संसद की मुहर लग गई है तो रेलमंत्री कोई भी उस पर सवाल तो खड़े किए ही जा सकते हैं। लेकिन ममता बनर्जी गईं तो पत्रकार उनके बजट के साथ ही उनके विजन ट्वेंटी - ट्वेंटी को भी भूल गए, जिसमें  तमाम बड़ी बड़ी बातें की गईं थीं। ममता बनर्जी ने दर्जन भर कमेंटिया बनाईं थी, जिन पर लाखों  रुपये खर्च हुए, उन कमेटियों की रिपोर्ट क्या है और उन रिपोर्टों  पर काम क्या हुआ? किसे ने ये सवाल नहीं उठाया। चलिए रेल बजट पर बहुत चर्चा हो गई। वैसे रेल बजट की बारीकियां आपको  जाननी है तो आप मेरे दूसरे ब्लाग " आधा सच " को  जरूर पढें। यहां आपको ऐसी जानकारी मिलेगी जो आपके लिए संग्रहणीय भी हो सकती है।

लिंक..   http://aadhasachonline.blogspot.in/2013/02/blog-post_27.html#comment-form

वैसे सच बताऊं तो आम बजट पर मैं भी उतना बात नहीं कर पाऊंगा। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि बजट को लेकर जो रिपोर्टिंग चैनलों पर होती है, वो बहुत ही सतही स्तर की होती है। अगर इसे आपको और आसान शब्दों मे समझाना हो तो मैं कह सकता हूं कि चैनल देखते हुए लगता है कि ग्रेजुएट कर चुका छात्र सौ तक गिनती तक नहीं जानता। बजट के एक दिन पहले हमने देखा कि कई चैनलों के पत्रकारों ने एक-एक साफ-सुथरे किचन का इंतजाम कर लिया। चूंकि इस दिन उन्हें सुबह से फील्ड में भिड़ना होता है तो ऐसा किचन ज्यादा बेहतर साबित होता है जहां नाश्ता पानी का भी जुगाड़ बना रहे और काम धाम भी चलता रहे। मतलब भइया के साथ तो कहीं भी छन जाती है, आज बारी भाभी और बच्चों की भी है। भाभी को पता चला कि चैनल वाले उनके घर के किचन से लाइव करेंगे तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं। पूरे दिन अपने रिश्तेदारों को फोन लगाती रहीं बजट वाले दिन सुबह मुझे टीवी पर देखना। छोटी बहन को फोन लगाया कि कौन सी साड़ी में जचूंगी। फटाफट बैंक के लाकर से सारे गहने निकाल लाईं। अब टनाटन सजी भाभी से सब्जियों के दाम पूछे जाते हैं तो वो आधा अंग्रेजी और आधा हिंदी में बताती हैं कि आलू यानि पोटेटो 20 रुपये किलो, टोमैटो तो और मंहगा है। पत्रकार को समझ मे आ गया कि भाभी को सब्जी के बारे में कुछ भी पता नहीं है, क्योंकि आलू तो आज कल 10 रुपये का सवा किलो मिल रहा है। फिर बेचारी भाभी  टमाटर का तो दाम भी नहीं बता पाती हैं, वो  टौमेटो को और मंहगा कह कर काम चल रही हैं। जबकि टमाटर भी 10 से 15 रुपये किलो है इन दिनों।

भाभी तो लाइव हैं, पत्रकार बेचारे की मुश्किल बढ़ जाती है, वो तुरंत अनाज के दाम पर आ जाता है। उसे लगता है कि अगर चावल के दाम गलत भी बताए तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि चावल तो आज मार्केट में 20 रुपये लेकर 120 रुपये किलो तक का है। यही हाल दाल और अन्य अनाज का भी है, तो बेचारा पत्रकार किसी तरह अनाज के दाम पूछ कर समय काटता है। अब भाभी तो निकली बासमती चावल और आशीर्वाद आटा खाने वाली, लेकिन पत्रकारो को तो ये बताना है कि आप देख सकते हैं कि आज सामान्य घर में खाने की थाली कितनी मंहगी हो गई है। मंहगाई से हालत ये है कि भाभी को थाली से सब्जी हटानी पड़ गई है। बेचारा पत्रकार स्टोरी की लाइन से खत्म करना चाहता है, लेकिन भाभी ने तुरंत टोक दिया, अरे भइया ये क्या कह रहे हैं आप ? मैने अपने तमाम रिश्तेदारों को बताया कि वो आज फलां चैनल देखें, मैं अपना किचन दिखाऊंगी, आप तो ऐसी बातें कर रहे हैं कि हमारे रिश्तेदार मेरे घर ही आना ही छोड़ देंगे। उन्हें लगेगा कि बेचारे पूरा खाना भी नहीं खा रहे हैं, ऐसे में क्यों उन पर बोझ बना जाए। भाभी बोलना शुरू हुई तो चुप ही नहीं हुई, उन्होने कहा कि जिस तरह से आप खाने की थाली से सब्जी हटा रहे हैं,  हो सकता है कि शाम तक मेरे पापा यहां ना आ जाएं और पूरे महीने का अनाज सब्जी वो खुद ही दिलाने की जिद्द करने लगेंगे। प्लीज भैया ऐसे मत बोलिए।

हाहाहा अब तो पत्रकार जी का नशा काफूर हो गया। वो तो आए थे मंहगे किचन में अपने दिन भर के बढिया लाइव के इंतजाम से, लेकिन पहले ही लाइव में उन्हें नाश्ता ही नहीं भरपेट भोजन मिल गया। समझ गए कि  यहां से तो जाना ही बेहतर है, अब बेचारे किसी और के घर फोन करते तो अचानक कोई तैयार नहीं होता। फिर तो बेहतर यही था कि सब्जी मंडी पहुंच जाए और वहीं सब्जी खरीदने आने वालों से सीधी बात चीत हो। जब भी आप किसी इवेंट को मैनेज करने की कोशिश करेंगे तो ऐसी मुश्किल आएगी ही। अब भाभी को ये तो पता नहीं था कि उन्हें रोनी सूरत बनाकर मंहगाई को लेकर हाय तौबा करनी हैं। उन्हें तो जैसे ही पता चला कि अरे वो टीवी पर आएंगी, सबसे पहले बैंक जाकर लाकर में रखे सारे गहने उठा लाईं और शादी में मिले इन मोटे-मोटे जेवर को पहन कर गरीबी की बात भी करतीं हई भी  तो बेईमानी लग रही थी। खैर कोई नहीं टीवी पत्रकारों के साथ ये सब चलता रहता है।

दिल्ली गैंगरेप पीडित बेटी को लेकर मैं बहुत मर्माहत हूं, सच कहूं तो उसकी मौत की खबर ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया। लेकिन उस बेटी के नाम पर हो रही सियासत से मुझे घिन्न आ रही है। वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने जब बजट पढ़ते हुए ऐलान किया कि  महिलाओं की सुरक्षा के लिए "निर्भया फंड" की व्यवस्था की गई है, तो मुझे अपने उस पत्रकार भाई की याद आई, जिसने प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान मंत्री पर जूता उछाल दिया था। हालाकि मैं हिंसा और बेहूदगी में कत्तई यकीन नहीं करता, लेकिन जब ऐसी घटिया बात सदन में की जाती है तो मैं कहता हूं कि मेरे पत्रकार भाई ने कुछ भी गलत नहीं किया था। मुझे लगा कि क्या ये भी ऐसा विषय है जिस पर राजनीति की जाए ? निर्भया, जिसने दिल्ली ही नहीं, देश के तमाम हिस्सों में नौजवानों को आन्दोलित किया, जो महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा एवं उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का प्रतीक बन कर देश में उभरी, उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी कुर्बानी को एक दिन सरकार इस तरह भुनाने की कोशिश करेगी। अपना आठवां बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने ऐलान किया कि  सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष निर्भया फंड बनाने जा रही है और जिसके लिए एक हजार करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

एक  हजार करोड़ का फंड बनाकर क्या संदेश देने की कोशिश की गई है। ये बात मेरी समझ में तो नहीं आ रही है। मुझे डर है कि कहीं सरकार अब राज्यों को ये टारगेट ना थमा दे कि जो फंड दिया गया है इसे निश्चित अवधि में खत्म भी करना है। फंड इस्तेमाल तभी होगा जब महिलाएं शोषण का शिकार होगीं। मेरा कहने का आशय ये है कि जब मंत्री और सरकार इतने असंवेदनशील हो जाएं तो इनसे किसी तरह की उम्मीद करना बेमानी है। जो सरकार बेटी की अस्मिता को बाजार में ढकेलने की साजिश करे, उसके बारे में क्या चर्चा की जाए। इस मुद्दे पर चैनल और समाचार पत्र दोनों खामोश रहें तो लगता है कि बाजार सब चीजों पर कितना हावी है। मीडिया भले खामोश हो, पर मैं वित्तमंत्री के आम बजट को कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र से ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये देश का बजट नहीं हो सकता, इसे अगले साल  होने वाले चुनाव की तैयारी कहें तो गलत नहीं होगा।

वैसे भी आम आदमी बजट में दो चीजें देखता है। अगर रेल बजट है तो वो देखता है किराया कम हुआ या नहीं। किराया कम हुआ तो बजट बढिया और नहीं हुआ तो घटिया। रेलमंत्री ने तो किराए में भारी वृद्धि कर दी है तो रेल बजट को बढिया कहने का सवाल  ही नहीं। इसी तरह आम बजट में आम आदमी देखता है कि इनकम टैक्स में कोई राहत दी गई या नहीं। महिलाएं देखती हैं कि गैस सिलेंडर की कीमतें कुछ कम हो रही है या नहीं। मजदूर तपके को उम्मीद होती है कि क्या वो अब दो वक्त शुकून से रोटी खा सकता है या नहीं। मुझे कांग्रेस सरकार बताएगी कि क्या आम आदमी के मानदंड पर उसका बजट कहीं से खरा उतरता है? यहां मीडिया एक अहम भूमिका निभा सकती थी, लेकिन मीडिया की पहुंच वास्तविक लोगों तक शायद नहीं रही, यही वजह है कि मीडिया और बजट दोनों मूल विषय से भटके रहे। अब सवाल ये उठता है कि जब सरकार गूंगी और बहरी हो और देश की मीडिया नासमझ हो गई हो तो फिर मूल समस्या पर भला कौन आवाज उठाएगा।