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Friday, 16 October 2015

इंदौर : पत्रकारिता के पापी !





मैच के पहले ...


मैच के बाद ...




दोनों खबरें अलग अलग हैं मगर अखबार एक ही है। ये महज एक खबर नहीं है, सच तो ये है कि ऐसी खबरें अखबार और संपादक का चरित्र बताती है। चलिए खबर का थोडा रेफरेंस भी बता दूं,  14 अक्टूबर को इंदौर में चार साल बाद क्रिकेट का कोई अंतर्राष्ट्रीय मैच हो रहा था, इसके टिकट के लिए काफी मारामारी थी। आलम ये था कि 11अक्टूबर यानि रविवार को बैंक से टिकट मिलने थे, लेकिन पगलाए क्रिकेटप्रेमी शनिवार को ही दोपहर से लाइन में लग गए । इन बेचारों ने पूरी रात सड़क पर काट दी, सुबह हुआ तो  भीड़ और बढ़ गई, बेचारे पुलिस की लाठियां तक खाई फिर भी टिकट के लिए जद्दोजहद करते रहे, इसके बाद भी टिकट नहीं मिला। फिर मैच के दो दिन पहले जब  इंदौर के एक बडे अखबार में पहले पेज पर खबर छपी " आखिर टिकट गए कहां " तो लोगों को लगा कि अखबार ने जिम्मेदारी निभाई और कम से कम आम जनता की बात को इस अखबार ने रखा, लेकिन मैच के दो दिन बाद दूसरी खबर छपी " वन डे की जीत ने टिकटों की मारामारी को भुला दिया "  तब सवाल उठा संपादक जी पर ! अगर हम कहें कि सिर्फ सवाल उठा तो गलत होगा, सही मायने में उंगली उठी संपादक जी पर .... ।

संपादक जी, आपकी जानकारी गलत है,  टिकटों की मारामारी को जनता ने नहीं भुला दिया, आपने भुला दिया। आपने क्यों भुला दिया, ये आप बेहतर जानते हैं, हम तो इतना जानते हैं कि आपको मैच के एक दिन पहले देर रात में पास मिल गए थे। वैसे संपादक जी आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पास तो कुछ और संपादकों को भी भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। कुछेक संपादक तो रिपोर्टर वाला पास ही गले लटकाए मुंह निपोरते हए स्टेडियम में मौजूद थे। संपादक जी, समझ में नहीं आ रहा कि  आप टिकटों की मारामारी कैसे भूल गए ?  अखबार ही ध्यान से पढ़ लीजिए तो पता चल जाएगा कि लोग भूले या नहीं । श्रीनगर से मैच देखने आए लोग इंदौर में धक्के खाते रहे टिकट नहीं मिला, वो मायूस होकर लौट गए और आप कह रहे हैं कि वो सब भूल गए ? वाराणसी से दस लोगों की टीम यहां दो दिन तक धक्के खाती रही, आखिर तक मैच नहीं देख पाए, वो भी भूल गए ? बैंक के सामने 24 घंटे से भी ज्यादा समय तक लोग लाइन में लगे और फिर भी टिकट हाथ नहीं लगा, इंदौर की वो आम जनता टिकट की मारामारी को भूल गई ? संपादक जी टिकट की मारामारी सिर्फ आप भूल गए, फिर इस बात जोर देकर कह रहा हूं कि आप ही भूल गएं । क्यों भूल गए ? इसके लिए मुझे मजबूरी में मुझे कुछ कांग्रेस नेताओं का नाम लेना पडेगा और मैं बेवजह उन्हें अपने लेख में जगह देना नहीं चाहता।

जिस तरह के हालात आपने बना दिए हैं, उससे तो मन तो होता है कि मौका है अभी ही  इंदौर की कुछ टाउनशिप की बात भी करूं, मन तो ये भी है कि तुलसीनगर के पूरे मसले को तार-तार कर दूं। कुछ और बडे बडे मामलों की चर्चा करूं,  फिर लगता है कि नहीं, उसकी चर्चा सही वक्त आने पर की जाएगी। मुझे तो इंदौर में आए सिर्फ छह महीने हुए हैं, लेकिन दिल्ली, यूपी और पूर्वोत्तर भारत की २५ साल की पत्रकारिता पर ये छह महीने का अनुभव भारी है। दिल्ली में रहने के दौरान जब कभी भी खराब राज्य की बात होती तो लोग यूपी और बिहार की ओर देखने लगते हैं,  खराब प्रशासनिक अधिकारियों की बात हो तो भी लोग यूपी और बिहार की तरफ देखते हैं,  खराब कानून व्यवस्था की बात हो फिर यूपी बिहार का जिक्र होता है। इतना ही नहीं जब पत्रकारिता में भ्रष्टाचार की बात हो तो भी यही राज्य सामने आते हैं। लेकिन इंदौर ने मेरी जानकारी में इजाफा किया है। मैं यूपी बिहार को मध्यप्रदेश के मुकाबले कई गुना बेहतर मानता हूं। वहां के अफसर कितने भी दबाव में हों लेकिन अस्पताल में घायल पड़े गरीब, लाचार मजदूर का लिवर, किडनी और आंखें नहीं निकलवा सकते, यहां के अधिकारी ने ये किया। वहां भ्रष्टाचार में बडे से बड़ा नेता मंत्री जेल जाता है, यहां व्यापम मामले में अब तक ४२ लोगों की रहस्यमय तरीके से मौत हो चुकी है, फिर भी नेता अफसर सब ताल ठोंक रहे हैं। पत्रकारों की बात करें तो पाएंगे कि पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को बनाए रखने के लिए यूपी - बिहार के  पत्रकारों ने अपनी जान दे दी। आए दिन इन दोनों राज्यों से पत्रकारों की हत्या की खबरें मिलती है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वहां पत्रकारिता की आड में बेईमानी नहीं होती, पर ये दावा जरूर करूंगा कि जो कुछ यहां देखने को मिल रहा है, उसके मुकाबले वहां १० प्रतिशत भी पत्रकार बेईमान नहीं हैं।

वैसे आज सूबे की सियासत की बात छोड़ देते हैं,  आम आदमी की जान ले लेने वाले अफसर की भी बात नहीं करूंगा। आज सिर्फ अपने पेशे के भीतर झांकने की कोशिश करूंगा। यहां पत्रकारिता में भ्रष्टाचार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इंदौर से ही प्रकाशित होने वाले एक अखबार में पहले पेज पर पत्रकारों की बेईमानी की खबर इस पेज की लीड खबर बनती है। इतना ही नहीं १० दिन से ये खबर नए तथ्यों के साथ पहले पेज पर बरकरार है। हालाकि अब इन पत्रकारों के मामले में बकायदा रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है, पुलिस अपना काम कर रही है। अखबार की खबर में भी यही तथ्य हैं कि जिनके खिलाफ मामला दर्ज है या फिर जो पकडे गए हैं ये तो महज प्यादे हैं, इनका बाँस बोले तो शाकाल कोई और है। मेरे ख्याल से तो इस शाकाल को पकड़ना कम से कम मध्य प्रदेश की पुलिस के लिए ना सिर्फ मुश्किल है बल्कि नामुमकिन है। अच्छा सच तो ये है कि पुलिस जिसे शाकाल समझ रही है वो शाकाल की शक्ल में बहुरुपिए है। बडे वाले तक तो न पुलिस पहुंचने की कोशिश कर रही है और न ही पहुंचना चाहती है।




Friday, 29 May 2015

इंदौर : तालीबानी पुलिस या पत्रकारिता

दिल्ली की पत्रकारिता का बुरा हाल है,  कुछ समय तक मैं खुद दिल्ली में इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक बड़े ग्रुप का हिस्सा रहा हूं । अनुभव के आधार पर एक बात बताता हूं, आपको लगता है होगा कि चैनल पर क्या खबर चलेगी और क्या नहीं ये चैनल के संपादक तय करते होगे, पर ऐसा नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में वीजुअल अपना स्थान बनाती हैं।

सच बताऊं इलेक्ट्रानिक मीडिया अब बताने की नहीं भोकने की पत्रकारिता होती जा रही है। २९ मई यानि शुक्रवार को सुबह से आज तक, एबीपी और इंडिया टीवी समेत कुछ और चैनलों ने शोर मचाना शुरू किया " इंदौर में तालिबानी पुलिस " अब तालिबानी पुलिस क्यों, कहा पुलिस गुंडों को सड़क पर सरेआम पुलिस पीट रही है। आखिर गुंडों को इस तरह पीटने का अधिकार पुलिस को किसने दे दिया ?

अब देखिए लाठी चलाती पुलिस के विजुअल में फुल एक्शन है, ड्रामा है, इंटरटेनमेंट है और इमोशन भी है। ऐसे में संपादक का दिमाग गया तेल लेने। संपादक के दो एक चंपू हर आर्गनाइजेशन में होते हैं, वो बताते हैं कि सर कमाल का विजुअल है, " खेल " जाते हैं। टीवी में खबर चलाने को खेलना कहा जाता है । वैसे भी बुलेटिन में कुछ नहीं है। संपादक ये भी जानने की कोशिश नहीं करता कि अगर पुलिस कोई अभियान चला रही है तो उसकी वजह क्या है ? अचानक यूं ही तो सड़क लाठी भांजेगी नहीं।

बहरहाल अब घटना सुनिए । वैसे तो इंदौर शांत शहर है, यहां कुछ समय पहले रात १२ बजे भी महिलाएं स्कूटी से सड़क पर बिना डर निकलती दिखाई पड़ जाती थीं। लेकिन दो तीन महीने से अलग तरह की वारदात हो रही है। एक दवा जिसे यहां की भाषा में " नाइट्रा " कहा जाता है,  उसे ये सड़क छाप बदमाश शराब और बीयर में मिलाकर पीते हैं। इससे उन्हें तुंरत नशा होता है, फिर शुरू होता है इनका नंगा नाच। ये हाथ में छुरा लेकर बाइक पर निकलते हैं, और जो भी मिलता है उसे छुरा से कट मारते हुए निकल जाते हैं। ये एक बार में कई लोगों को घायल कर देते हैं। इस तरह की घटना पिछले १५ दिन से कहीं ना कहीं जरूर हो रही है।

दिल्ली की घटना थी, इसलिए निर्भया कांड को दिल्ली के चैनलों ने सिर पर उठा लिया, इंदौर के इन्हीं नशेडियों ने सिर्फ तीन दिन पहले रात नौ बजे एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसके साथी के साथ मारपीट की। दिल्ली की मीडिया चुप रही। हफ्ते भर पहले दिन में ही इन गुंडों ने शहर के पाश इलाके विजयनगर में सरेआम एक व्यापारी से उसके दुकान पर मारपीट की और लूटने की कोशिश की,  १५ दिन पहले एक दंपत्ति को इन नशेडियों ने छुरा से घायल कर उनकी कार छीन ली। लगातार अपराधिक घटनाएं यहां हो रही हैं।

पूरा इंदौर इस अपाराधिक घटना से परेशान है, जब पानी सिर के ऊपर हो गया और इंदौर पुलिस के खिलाफ यहां के अखबारों ने बकायदा अभियान चलाना शुरू किया, फिर जाकर पुलिस एक्शन मे आई तो इलेक्ट्रानिक मीडिया भोकने लगी। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि इँदौर के हालात क्या हैं, क्या वाकई कानून व्यवस्था की हालत इतनी बुरी हो गई है कि पुलिस को सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा है।

आम आदमी को छूरा भोंका जा रहा है,  टीवी पत्रकारों की ये खबर तो चैनल पर चल नहीं सकती, इसी खबर को अगर इंदौर का रिपोर्टर ये बताए की पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ अभियान तेज किया तो खबर गिर जाएगी। इसलिए मजबूरी में मानवाधिकार की आड़ लेते हुए ये कहना आसान है कि आखिर पुलिस को किसने अधिकार दे दिया कि वो सरेआम गुंडों की पिटाई करें ? अब इस मूर्खता पर क्या बहस करूं ?


पहले ही बताया कि मैं भी कुछ समय पहले इसी मंडली का मेंबर रहा हूं, इसलिए अच्छी तरह जानता हूं कि न्यूजरूम में कैसे खबर चलाई या गिराई जाती है, कैसे खबर पर चढ़ा जाता है और कैसे खेला जाता है। ये सब मैं जानता हूं। लेकिन अब जब इंदौर में हूं और जमीन की सच्चाई देख रहा हूं और टीवी की बकवास भी सुन रहा हूं तो जरूर हैरानी होती है। हैरानी इसलिए भी ज्यादा हुई कि सुबह आज तक पर जब ये खबर मैने देखी तो चैनल के एक वरिष्ठ मित्र को फोन कर हकीकत बताया भी कि सच क्या है और स्थानीय अखबार यहां बढ़ते अपराध के लिए अभियान चलाए हुए थे, इसलिए पुलिस का एक्शन जायज है, लेकिन कोई फायदा नहीं, खबर देर शाम तक चलती रही, बहरहाल जो बिकता है वो दिखता है। पुलिस वालों पर इसलिए मीडिया का असर भी नहीं रहा।