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Thursday, 26 February 2015

रेल बजट : डरपोक लगे प्रभु !

रेल बजट से सिर्फ निराशा ही नहीं हुई बल्कि इस बजट ने रेलवे बोर्ड के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं ! बजट पर बात करूंगा, लेकिन पहले रेलवे बोर्ड की प्रासंगिकता पर बात करना जरूरी हो गया है। इस बजट को सुनने के बाद मन में जो पहला सवाल है वो ये कि रेलवे बोर्ड की आखिर जरूरत क्या है ? जर्नलिज्म से जुड़े होने की वजह से मेरा 15 - 20 साल से रेलवे और बोर्ड के तमाम अफसरों से संपर्क रहा है, इसलिए रेलवे के सिस्टम को बखूबी समझता हूं। बोर्ड में मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरों की जबर्दस्त खेमेबंदी है। दोनों गुट की कोशिश रहती है कि बोर्ड में उनकी तूती बोलती रहे, इसके लिए ये बहुत नीचे तक गिर जाते हैं। खैर इस मसले पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी, आज मैं ये जानना चाहता हूं कि रेलवे बोर्ड के पास ना कोई प्लानिंग है ना कोई विजन है और ना ही कोई सिस्टम है, ऐसे में रेलवे को इस हाथी ( रेलवे बोर्ड ) की जरूरत क्यों है ? ये इंजीनियर ट्रेन को पटरी से उतार देगें, वरना मेरा तो यही मानना है कि बोर्ड का प्रबंधन इंजीनियरों से लेकर IAS को सौंप दिया जाना चाहिए, क्योंकि मुझे लगता है कि योजना, बजट, अनुशासन ये सब एक इंजीनियर के मुकाबले IAS बेहतर कर सकता है।  

आइये बजट पर चर्चा करते हैं। रेलमंत्री सुरेश प्रभु पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट है, इसलिए वो गुणा भाग में माहिर हैं। उनकी ये महानता बजट में दिखाई दी और उन्होंने सबसे बड़ा झूठ ये कहाकि आज रेलवे का आँपरेशन रेसियो 88.5 है। मतलब रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए 88.50 रुपये खर्च करता है। सच्चाई ये है कि रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए करीब 113 रुपये खर्च करती है। वैसे प्रभु आपकी लीला अपंरपार है, आपने कहा कि अभी तक लोग 60 दिन पहले का ही रिजर्वेशन करा सकते थे, जिसे बढ़ाकर 120 दिन कर दिया गया है। मतलब लगभग पांच हजार करोड रूपये बिना सफर कराए ही एडवांस में रेलवे के खाते में जमा हो जाएंगे । यात्रियों की इस रकम पर बैंक तो रेलवे को ब्याज देगा, लेकिन टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो रेलवे यात्री को पूरा पैसा तक वापस नहीं करेगी, वो कैंसिलेशन चार्ज वसूलेगी। फिर चार महीने बाद क्या होगा ये साधारण यात्री तो नहीं जानता, ये तो प्रभु आपको ही पता हो सकता है। 

प्रभु आपका ये ऐलान कि ट्रेनों और प्लेटफार्म पर विज्ञापन के जरिए रेलवे आय का स्रोत बढाएगी, ये बात तो समझ में आती है। लेकिन आप का ये ऐलान गले नहीं उतरा कि कंपनियों के नाम पर स्टेशन और ट्रेन का नाम रखकर बड़ी रकम वसूल की जाएगी। मुझे याद है कि पूर्व रेलमंत्री स्व. कमलापति त्रिपाठी ने एक बार रेल के अफसरों को इसीलिए लताड लगाई थी कि वो ट्रेनों का नाम ठीक तरह से नहीं रखते थे। पहले ट्रेन का नाम होता था, बाम्बे मेल, तूफान मेल, कालका मेल आदि आदि। स्व. त्रिपाठी ने कहाकि ट्रेन के नाम सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पहचान के आधार पर रखे जाएं। उनके समय में जो भी ट्रेनें चलीं उनका नाम बहुत सोच समझ कर रखा जाता था, जैसे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, त्रिवेणी एक्सप्रेस, गंगा गोमती एक्सप्रेस, हिमगिरी एक्सप्रेस इत्यादि। लेकिन प्रभु आपके ऐलान के बाद तो लगता है कि ट्रेनों का नाम होगा एमडीएच चिकन मसाला एक्सप्रेस, कुरकुरे एक्सप्रेस, पेप्सी मेल, सहारा एक्सप्रेस, जाँकी अंडरवियर सुपरफास्ट ट्रेन, तुफान बीडी मेल, बेगपाईपर सुपर फास्ट ! ये सब क्या है प्रभू ? 

वैसे प्रभु एक बात बताऊं, पूर्व रेलमंत्री लालू यादव को आज मैं वाकई याद कर रहा हूं। लालू का मैं बड़ा आलोचक रहा हूं, लेकिन आपके बजट के बाद इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि लालू बजट पर मेहनत करते थे और उनके बजट में रेलवे के मुनाफे के साथ दूरदर्शिता दिखाई देती थी। लालू ने रेलवे बोर्ड के इंजीनियरों पर आंख मूंद कर कभी भरोसा नहीं किया, वो अपने साथ बिहार कैडर के कुछ आईएएस अफसरों को  अपना OSD बनाकर बोर्ड में बैठा दिया था। नतीजा ये हुआ कि बिगडैल इंजीनियरों पर लगाम कसा जा सका। सच कहूं प्रभु आपका बजट तो मैं अभी तक यही नहीं समझ पा रहा हूं कि ये है किसके लिए ? इसे ना यात्रियों का बजट कह सकते है, ना रेल कर्मचारियों का बजट कह सकते हैं और ना ही व्यापारियों का बजट कह सकते हैं। संसद में आपने साफ-साफ बता दिया कि दिल्ली मुंबई राजधानी की औसत गति सिर्फ 79 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि दूसरी राजधानी की औसत गति तो 55 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटा ही है। इसलिए प्रभु जी आपने ऐलान किया कि आप कुल 9 रेलमार्ग पर गति सीमा बढ़ाएंगे। पता नहीं आपको याद है या नहीं, लेकिन ये काम लालू यादव ने शुरू किया था, उन्होंने सबसे पहले दिल्ली से आगरा तक भोपाल शताब्दी को 150 किलोमीटर की रफ्तार से चलाने की कोशिश की। कई साल काम चला, रेलवे ने 180 करोड रुपये ज्यादा पटरियों को अपग्रेड करने पर खर्च भी किया। लेकिन आज भी भोपाल शताब्दी की औसत गति 110 - 120 किलोमीटर ही है। मुझे लगता है कि बोर्ड के इंजीनियरों ने मोटा माल बनाने के लिए पुरानी पटरी को अपग्रेड करने का तरीका तलाशा है। 

साफ-सफाई तो खैर जितना भी हो कम है, इस पर आपने ध्यान दिया है अच्छी बात है। लेकिन फिर मुझे कहना पड़ रहा है कि बोगी में बायो टायलेट की शुरुआत पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ना सिर्फ अपने बजट में कर चुके है, बल्कि उनके समय में ही आईआरडीएसओ ने एक बोगी तैयार कर दिल्ली में इसका प्रदर्शन भी किया था। इस दौरान लालू के साथ कैबिनेट मंत्री रहीं अंबिका सोनी भी मौजूद थीं। आपने कहाकि मेक इन इंडिया के तहत इंजन, बोगी, पहिए देश में बनाए जाएंगे। प्रभु देश में तो आज भी ये तीनों चीजें बन रही हैं, हां जरूरत के मुताबिक उत्पादन नही कर पा रहे हैं। सफर के दौरान यूज एंड थ्रो बेडरोल की बात नई जरूर है, बहरहाल इसका इंतजार रहेगा। ये अच्छा प्रयास है। 

प्रभु आपके एक ऐलान से तो मेरा पूरा परिवार हंसते हंसते थक गया। आपने कहाकि चार महीने पहले आप ट्रेन का टिकट ले सकते हैं और टिकट लेने के दौरान ही मनचाहे खाने का आर्डर भी IRCTC के जरिए आँनलाइन ही कर सकते है। पहला तो ये कि जहां लोग सुबह नाश्ते के बाद सोचते हों कि लंच में क्या खाया जाए, वहां आप चार महीने पहले खाने के आर्डर को मनचाहा खाना बता रहे हैं। चलिए ये तो कोई खास नहीं.. लेकिन एक वाकया बताता हूं। दिल्ली से गोवा जा रहा था, ट्रेन को दोपहर एक बजे भोपाल पहुंचना था, एक  मित्र ने कहाकि भोपाल में वो खाना लेकर आएंगे ! ट्रेन 6 घंटे लेट हो गई और हम सभी  बिस्किट खाकर भूख से जूझते रहे। ट्रेनों की लेट लतीफी के बीच अगर यात्री भोजन का इंतजार करता रहा तो उसका भगवान ही मालिक है। 

जनरल कोच में मोबाइल चार्ज करने की सुविधा दे रहे हैं, लेकिन प्रभु कुछ ऐसा कीजिए कि सामान्य श्रेणी के कोच में यात्री आराम से सफर भर कर सके, तो भी चल जाएगा। स्टेशन पर फ्री वाईफाई भी गैरजरूरी बात लगती है, क्योंकि आज कल सभी के फोन पर नेट की सुविधा आमतौर पर होती ही है। सरकारी पैसे को बेवजह खर्च करने की जरूरत नहीं है। और हां प्रभु ये बताएं आपने एक भी नई ट्रेन का ऐलान नहीं किया ! मुझे तो ये बात समझ में ही नहीं आ रही है। आपको पता है कि लोगों को आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है, रेलवे आज भी डिमांड पूरी नहीं कर पा रही है ऐसे में नई ट्रेन का ऐलान होना ही चाहिए। मुझे पता है कि रेल रूट बिजी है, लेकिन जब आप कह रहे हैं कि ट्रेनों की स्पीड बढ़ाकर कुछ समय निकाला जाएगा, तो नई ट्रेन चलाई जा सकती है। इससे तो आपकी और बोर्ड अफसरों में इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। डिमांड पूरी करने के लिए ट्रेनों में बोगी बढ़ाने की बात कर रहे हैं, ज्यादातर ट्रेनो में 24 कोच लगाए जा रहे हैं, इससे ज्यादा कोच लगाने की क्षमता ही नहीं है। कई रेलवे स्टेशन पर तो 24 कोच की ही ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी नहीं हो पाती है, फिर और बोगी बढ़ाने की बात तो बेमानी लगती है। 

आखिर में रेलवे के आय पर बात करना है। एक बार फिर बजट में पीपीपी की बात की गई है। प्रभु आपको पता है कि वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन के लिए पीपीपी के तहत देश विदेश से टेंडर आमंत्रित किए गए थे, लेकिन कोई भी आवेदन नहीं आया। दरअसल सच्चाई ये है कि भारतीय रेल पर किसी को भरोसा ही नहीं है। आपने सिर्फ पीठ थपथपाने के लिए रेल किराए में कोई बढोत्तरी नहीं की। मै तो आपके इस फैसले से पूरी तरह असहमत हूं। देश में रोजाना 2.30 करोड यात्री ट्रेन से सफर करते हैं। इसमें अकेले मुंबई में 85 लाख यात्री रोजाना लोकल ट्रेन से सफर करता है। अभी वहां तीन महीने का मासिक सीजन टिकट सिर्फ 15 दिन के किराए पर दिया जाता है। मासिक सीजन टिकट में बढोत्तरी की गुंजाइश थी, लेकिन आपने नहीं किया। इसी तरह अपर क्लास का किराया लगातार बढाया गया है लेकिन जनरल और स्लीपर क्लास में किराया नहीं बढ़ा है, इसलिए जरूरी है कि किराए को तर्कसंगत बनाया जाए। माल भाडा बढ़ाया तो.. लेकिन आपकी हिम्मत नहीं हुई कि बजट भाषण में इसे आप पढ सकें। मुझे बजट तो दिशाहीन लगा ही प्रभु आप डरपोक भी नजर आए। 

चलते-चलते
रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अरुणेन्द्र कुमार टीवी बहस में इस रेल बजट को 10 में 11 नंबर दे रहे थे, मुझे लगता है कि उन्हें उम्मीद है कि बीजेपी सरकार रेलवे बोर्ड की किसी कमेटी का उन्हें चेयरमैन बना देगी !




Friday, 1 March 2013

मीडिया के मास्टर माइंड का सच !


इलेक्ट्रानिक मीडिया का बचकाना काम देखकर कई दफा हैरानी होती है। आप सब जानते हैं कि इस वक्त संसद का सबसे महत्वपूर्ण यानि बजट सत्र चल रहा है। संसद में रेल और आम बजट पेश किया जा चुका है और अब इस पर चर्चा शुरू होगी। लेकिन बजट के पहले मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया का हुडदंग देखने लायक होता है। मैं तो पांच-सात साल से देख रहा हूं कि बजट सत्र के पहले चैनल के बड़े दम खम भरने वाले जर्नलिस्ट ट्रेन पर सवार हो जाते हैं और वो सीधे बाथरूम को कैमरे पर दिखाते हुए साफ सफाई को लेकर रेल मंत्रालय को कोसते हैं, जो ज्यादा उत्साही पत्रकार होता है वो ट्रेन के खाने की बात करते हुए घटिया खाने की शिकायत करता है और उम्मीद करता है शायद इस बजट में रेलमंत्री का ध्यान इस ओर जाएगा। अच्छा आम बजट के पहले भी इसी तरह की एक घिसी पिटी कवायद शुरू होती है, चैनल की अच्छी दिखने वाली लड़की को किसी बडे आदमी के घर के किचन में भेज दिया जाता है। पांच तोले सोने की जेवरों से लदी उस घर की महिला वित्तमंत्री को समझाने की कोशिश करती है कि घर चलाना कितना मुश्किल हो गया है। सच तो ये है कि जिस घर में महिला पत्रकार जाती है, उस महिला को आटे चावल का सही सही दाम तक पता नहीं होता है।

हां आप सवाल पूछ सकते हैं कि आखिर गरीबों के यहां या फिर झोपड़ पट्टी में पत्रकार  जाकर खाने की थाली पर रिसर्च क्यों नहीं करते ? मैं कहूंगा कि आपने बहुत अच्छा सवाल किया है, पर चैनल खासतौर पर हिंदी चैनल मध्यम वर्गीय परिवार में देखा जाता है, गरीबों के यहां किचन तो होता नहीं है, वही चूल्हे में फूंक  मारती महिला से बात करनी पड़ेगी जो इतनी सारी समस्या गिना देगी कि उतना सब दिखाने का समय भी चैनल के पास नहीं है। अच्छा ये काम कोई ऐसा वैसा चैनल करे तो बात समझ में आती है, मुश्किल तो तब होती है जब खुद को नंबर एक कहने वाला चैनल ये काम करता है। अब देखिए ना " आज तक "  ने अपने 10 महिला पत्रकारों को रेल बजट से पहले ट्रेन की यात्रा कराई, उनसे कहा गया कि ट्रेन के सफर के दौरान होने वाली मुश्किलों को बताएं। अब चैनल के मास्टर माइंड को कौन समझाए कि ट्रेनों में होने वाली दिक्कतें तो आप कभी भी उठा सकते हैं, इसके लिए बजट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। संपादक जी अगर आज रेलवे स्टेशन पर गंदगी है, ट्रेनों में गंदगी है तो इंतजार करेंगे कि बजट के पहले ये स्टोरी की जाएगी। उसी समय, उसी दिन क्यों नहीं ? मजेदार तो ये कि शाम को इसी चैनल ने इतने फूहड़ तरीके से रेल बजट पर रिपोर्ट प्रसारित की माथा ठनक गया। शीर्षक सुनेंगे " छुपा कर क्यों बढाया रे " । अब इस दिमागी दिवालिएपन को आखिर क्या कहा जाए ? अरे भाई बजट में लुका छिपा क्या है, बजट की कापी तो संसद में पेश की गई है, इतना ही पत्रकारों के हाथ में भी वही बजट है। अब आपको समझ में ही देर से आया तो इसके लिए क्या किया जा सकता है।

सच कहूं तो चैनल के मास्टर माइंड कहे जाने वाले लोगों को बजट की एबीसीडी ही नहीं पता है। वरना वो सवाल उठाते कि पिछले बजट मे जो कुछ ऐलान किया गया था, वो अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ ? अगर पिछले बजट में घोषित सभी ट्रेनें पटरी पर अभी तक नहीं आईं तो नई ट्रेन का ऐलान क्यों किया जा रहा है ? अच्छा एक बहुत गलत फहमी है पत्रकारों को कि ये बजट रेलमंत्री का होता है, अरे भाई अगर बजट पर संसद की मुहर लग गई है तो रेलमंत्री कोई भी उस पर सवाल तो खड़े किए ही जा सकते हैं। लेकिन ममता बनर्जी गईं तो पत्रकार उनके बजट के साथ ही उनके विजन ट्वेंटी - ट्वेंटी को भी भूल गए, जिसमें  तमाम बड़ी बड़ी बातें की गईं थीं। ममता बनर्जी ने दर्जन भर कमेंटिया बनाईं थी, जिन पर लाखों  रुपये खर्च हुए, उन कमेटियों की रिपोर्ट क्या है और उन रिपोर्टों  पर काम क्या हुआ? किसे ने ये सवाल नहीं उठाया। चलिए रेल बजट पर बहुत चर्चा हो गई। वैसे रेल बजट की बारीकियां आपको  जाननी है तो आप मेरे दूसरे ब्लाग " आधा सच " को  जरूर पढें। यहां आपको ऐसी जानकारी मिलेगी जो आपके लिए संग्रहणीय भी हो सकती है।

लिंक..   http://aadhasachonline.blogspot.in/2013/02/blog-post_27.html#comment-form

वैसे सच बताऊं तो आम बजट पर मैं भी उतना बात नहीं कर पाऊंगा। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि बजट को लेकर जो रिपोर्टिंग चैनलों पर होती है, वो बहुत ही सतही स्तर की होती है। अगर इसे आपको और आसान शब्दों मे समझाना हो तो मैं कह सकता हूं कि चैनल देखते हुए लगता है कि ग्रेजुएट कर चुका छात्र सौ तक गिनती तक नहीं जानता। बजट के एक दिन पहले हमने देखा कि कई चैनलों के पत्रकारों ने एक-एक साफ-सुथरे किचन का इंतजाम कर लिया। चूंकि इस दिन उन्हें सुबह से फील्ड में भिड़ना होता है तो ऐसा किचन ज्यादा बेहतर साबित होता है जहां नाश्ता पानी का भी जुगाड़ बना रहे और काम धाम भी चलता रहे। मतलब भइया के साथ तो कहीं भी छन जाती है, आज बारी भाभी और बच्चों की भी है। भाभी को पता चला कि चैनल वाले उनके घर के किचन से लाइव करेंगे तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं। पूरे दिन अपने रिश्तेदारों को फोन लगाती रहीं बजट वाले दिन सुबह मुझे टीवी पर देखना। छोटी बहन को फोन लगाया कि कौन सी साड़ी में जचूंगी। फटाफट बैंक के लाकर से सारे गहने निकाल लाईं। अब टनाटन सजी भाभी से सब्जियों के दाम पूछे जाते हैं तो वो आधा अंग्रेजी और आधा हिंदी में बताती हैं कि आलू यानि पोटेटो 20 रुपये किलो, टोमैटो तो और मंहगा है। पत्रकार को समझ मे आ गया कि भाभी को सब्जी के बारे में कुछ भी पता नहीं है, क्योंकि आलू तो आज कल 10 रुपये का सवा किलो मिल रहा है। फिर बेचारी भाभी  टमाटर का तो दाम भी नहीं बता पाती हैं, वो  टौमेटो को और मंहगा कह कर काम चल रही हैं। जबकि टमाटर भी 10 से 15 रुपये किलो है इन दिनों।

भाभी तो लाइव हैं, पत्रकार बेचारे की मुश्किल बढ़ जाती है, वो तुरंत अनाज के दाम पर आ जाता है। उसे लगता है कि अगर चावल के दाम गलत भी बताए तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि चावल तो आज मार्केट में 20 रुपये लेकर 120 रुपये किलो तक का है। यही हाल दाल और अन्य अनाज का भी है, तो बेचारा पत्रकार किसी तरह अनाज के दाम पूछ कर समय काटता है। अब भाभी तो निकली बासमती चावल और आशीर्वाद आटा खाने वाली, लेकिन पत्रकारो को तो ये बताना है कि आप देख सकते हैं कि आज सामान्य घर में खाने की थाली कितनी मंहगी हो गई है। मंहगाई से हालत ये है कि भाभी को थाली से सब्जी हटानी पड़ गई है। बेचारा पत्रकार स्टोरी की लाइन से खत्म करना चाहता है, लेकिन भाभी ने तुरंत टोक दिया, अरे भइया ये क्या कह रहे हैं आप ? मैने अपने तमाम रिश्तेदारों को बताया कि वो आज फलां चैनल देखें, मैं अपना किचन दिखाऊंगी, आप तो ऐसी बातें कर रहे हैं कि हमारे रिश्तेदार मेरे घर ही आना ही छोड़ देंगे। उन्हें लगेगा कि बेचारे पूरा खाना भी नहीं खा रहे हैं, ऐसे में क्यों उन पर बोझ बना जाए। भाभी बोलना शुरू हुई तो चुप ही नहीं हुई, उन्होने कहा कि जिस तरह से आप खाने की थाली से सब्जी हटा रहे हैं,  हो सकता है कि शाम तक मेरे पापा यहां ना आ जाएं और पूरे महीने का अनाज सब्जी वो खुद ही दिलाने की जिद्द करने लगेंगे। प्लीज भैया ऐसे मत बोलिए।

हाहाहा अब तो पत्रकार जी का नशा काफूर हो गया। वो तो आए थे मंहगे किचन में अपने दिन भर के बढिया लाइव के इंतजाम से, लेकिन पहले ही लाइव में उन्हें नाश्ता ही नहीं भरपेट भोजन मिल गया। समझ गए कि  यहां से तो जाना ही बेहतर है, अब बेचारे किसी और के घर फोन करते तो अचानक कोई तैयार नहीं होता। फिर तो बेहतर यही था कि सब्जी मंडी पहुंच जाए और वहीं सब्जी खरीदने आने वालों से सीधी बात चीत हो। जब भी आप किसी इवेंट को मैनेज करने की कोशिश करेंगे तो ऐसी मुश्किल आएगी ही। अब भाभी को ये तो पता नहीं था कि उन्हें रोनी सूरत बनाकर मंहगाई को लेकर हाय तौबा करनी हैं। उन्हें तो जैसे ही पता चला कि अरे वो टीवी पर आएंगी, सबसे पहले बैंक जाकर लाकर में रखे सारे गहने उठा लाईं और शादी में मिले इन मोटे-मोटे जेवर को पहन कर गरीबी की बात भी करतीं हई भी  तो बेईमानी लग रही थी। खैर कोई नहीं टीवी पत्रकारों के साथ ये सब चलता रहता है।

दिल्ली गैंगरेप पीडित बेटी को लेकर मैं बहुत मर्माहत हूं, सच कहूं तो उसकी मौत की खबर ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया। लेकिन उस बेटी के नाम पर हो रही सियासत से मुझे घिन्न आ रही है। वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने जब बजट पढ़ते हुए ऐलान किया कि  महिलाओं की सुरक्षा के लिए "निर्भया फंड" की व्यवस्था की गई है, तो मुझे अपने उस पत्रकार भाई की याद आई, जिसने प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान मंत्री पर जूता उछाल दिया था। हालाकि मैं हिंसा और बेहूदगी में कत्तई यकीन नहीं करता, लेकिन जब ऐसी घटिया बात सदन में की जाती है तो मैं कहता हूं कि मेरे पत्रकार भाई ने कुछ भी गलत नहीं किया था। मुझे लगा कि क्या ये भी ऐसा विषय है जिस पर राजनीति की जाए ? निर्भया, जिसने दिल्ली ही नहीं, देश के तमाम हिस्सों में नौजवानों को आन्दोलित किया, जो महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा एवं उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का प्रतीक बन कर देश में उभरी, उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी कुर्बानी को एक दिन सरकार इस तरह भुनाने की कोशिश करेगी। अपना आठवां बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने ऐलान किया कि  सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष निर्भया फंड बनाने जा रही है और जिसके लिए एक हजार करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

एक  हजार करोड़ का फंड बनाकर क्या संदेश देने की कोशिश की गई है। ये बात मेरी समझ में तो नहीं आ रही है। मुझे डर है कि कहीं सरकार अब राज्यों को ये टारगेट ना थमा दे कि जो फंड दिया गया है इसे निश्चित अवधि में खत्म भी करना है। फंड इस्तेमाल तभी होगा जब महिलाएं शोषण का शिकार होगीं। मेरा कहने का आशय ये है कि जब मंत्री और सरकार इतने असंवेदनशील हो जाएं तो इनसे किसी तरह की उम्मीद करना बेमानी है। जो सरकार बेटी की अस्मिता को बाजार में ढकेलने की साजिश करे, उसके बारे में क्या चर्चा की जाए। इस मुद्दे पर चैनल और समाचार पत्र दोनों खामोश रहें तो लगता है कि बाजार सब चीजों पर कितना हावी है। मीडिया भले खामोश हो, पर मैं वित्तमंत्री के आम बजट को कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र से ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये देश का बजट नहीं हो सकता, इसे अगले साल  होने वाले चुनाव की तैयारी कहें तो गलत नहीं होगा।

वैसे भी आम आदमी बजट में दो चीजें देखता है। अगर रेल बजट है तो वो देखता है किराया कम हुआ या नहीं। किराया कम हुआ तो बजट बढिया और नहीं हुआ तो घटिया। रेलमंत्री ने तो किराए में भारी वृद्धि कर दी है तो रेल बजट को बढिया कहने का सवाल  ही नहीं। इसी तरह आम बजट में आम आदमी देखता है कि इनकम टैक्स में कोई राहत दी गई या नहीं। महिलाएं देखती हैं कि गैस सिलेंडर की कीमतें कुछ कम हो रही है या नहीं। मजदूर तपके को उम्मीद होती है कि क्या वो अब दो वक्त शुकून से रोटी खा सकता है या नहीं। मुझे कांग्रेस सरकार बताएगी कि क्या आम आदमी के मानदंड पर उसका बजट कहीं से खरा उतरता है? यहां मीडिया एक अहम भूमिका निभा सकती थी, लेकिन मीडिया की पहुंच वास्तविक लोगों तक शायद नहीं रही, यही वजह है कि मीडिया और बजट दोनों मूल विषय से भटके रहे। अब सवाल ये उठता है कि जब सरकार गूंगी और बहरी हो और देश की मीडिया नासमझ हो गई हो तो फिर मूल समस्या पर भला कौन आवाज उठाएगा।