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Tuesday, 19 November 2013

बिहार : पत्रकारों को चोर बना रहे हैं नीतीश !

बिहार के पत्रकार मित्र से बात हो रही थी, काफी दिन बाद उनसे मिलना हो रहा था, लिहाजा तय हुआ कि प्रेस क्लब में ही मिलते हैं। तय  समय पर प्रेस क्लब में पहुंच कर कुछ पीने-खाने का आर्डर दिया गया और बात घर परिवार से शुरू होकर बिहार की पत्रकारिता पर पहुंच गई। पत्रकारिता पर बात शुरू होते ही मित्र की आंखे डबडबा गईं, मैं फक्क पड़ गया। ऐसा क्या है कि मित्र की आँख में आंसू आ गया। मैने पूछा.. हुआ क्या ? इतना गंभीर क्यों हो गए ? भाई जब मित्र ने बोलना शुरू किया तो फिर एक सांस में बिहार की राजनीति को दो सौ गाली दी । कहने लगे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की पत्रकारिता को पूरी तरह दफन कर दिया है। अखबारों के मालिक विज्ञापन के लिए नीतीश के सामने घुटने टेक चुके हैं। अब नीतीश सरकार पत्रकारों को चोर बना रही है और उन्हें नगर पालिका के होर्डिंग्स आवंटित किए जा रहे हैं। ये सब सुनकर मैं तो हैरान रह गया, फिर मुझे भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू की वो टिप्पणी याद आई जो उन्होंने बिहार के लिए ही कही थी कि "बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव ही नहीं है" ।

मुझे याद है कि पांच छह महीने पहले भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैन मारकंडेय काटजू ने कहा था कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता संभव ही नहीं है, तो इस बात पर मुझे हैरानी हुई, मैने पूर्व जस्टिस काटजू के इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की थी। मैने कई जगह इस विषय पर लेख भी लिखा और काटजू साहब को कटघरे में खड़ा किया। लेकिन आज बिहार की पत्रकारिता की जो तस्वरी सामने आ रही है, वो वाकई बहुत चिंताजनक है। वहां हालत ये है कि किसी संपादक की औकात नहीं है बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ अखबार में एक भी शब्द लिख सकें। वहां एक बड़े अखबार समूह के संपादक ने बस थोड़ी कोशिश भर की थी कि उनको पटना से अखबार ने बेदखल कर दिया। हालांकि वहां संपादक को जब पता चला था कि मुख्यमंत्री नाराज हैं तो बेचारे उनसे मिलकर सफाई दे आए थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने माफ नहीं किया। अब सभी अखबार के संपादकों को पता है कि अगर बिहार में संपादक बने रहना है तो मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से पंगा नहीं लेना है।

पत्रकार मित्र ने बताया कि बीजेपी नेता नरेन्द्र मोदी ने पटना के गांधी मैदान में सभा को सबोधित करते हुए नीतीश कुमार को अहंकारी बताया था। एक अखबार के पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में ये शब्द इस्तेमाल कर दिया। बता रहे हैं कि संपादक ने उसे उल्टा टांग दिया। कहने लगे तुम्हें तो नौकरी करनी नहीं है, हमारी नौकरी के दुश्मन क्यों बन रहे हो ? आप समझ सकते हैं कि अगर किसी अखबार का संपादक ही इस कदर मुख्यमंत्री का पालतू बन चुका हो तो बाकी स्टाफ के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। इतनी बात करते-करते मित्र बिल्कुल उदास हो गए, कहने लगे बस ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि किसी तरह पटना से मुक्ति मिल जाए। बहरहाल मैने उन्हें मित्रवत सुझाव दिया कि भाई जब तक दूसरी जगह बात ना हो जाए, ऐसा वैसा कोई कदम मत उठाना।

संपादकों की बात करते-करते उन्होंने वहां के पत्रकारों के बारे में बताना शुरू किया। कहने लगे कि बिहार में जब पत्रकारों ने देखा कि उनके मालिक और संपादक ही सरकार के सामने दुम हिला रहे हैं, तो वो भला शेर क्यों बनें ? पत्रकारों ने भी शुकून से नौकरी का रास्ता अपना लिया। बता रहे हैं कि पटना में नगर पालिका ने सारे होर्डिंग्स का ठेका पत्रकारों को दे दिया है। पत्रकारों ने उनकी औकात के हिसाब से होर्डिंग्स दिए गए हैं। बड़े ग्रुप के अखबार या चैनल में हैं तो ऐसे पत्रकार को 20 से 25 होर्डिंग्स दिए गए हैं। उसके बाद 15, 10 और कुछ को पाच- सात से ही संतोष करना पड़ा है। पहले पत्रकारों को एक होर्डिंग्स के लिए सालाना 50 रुपये देने पड़ते थे। पत्रकार मित्र इस होर्डिंग्स को 15 से 25 हजार रुपये महीने में दूसरों को बेच दिया करते थे। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पिछले दिनों नगर पालिका ने होर्डिंग्स के किराए को रिवाइज किया और इसका किराया 50 रुपये सालाना से बढ़ाकर 200 रुपये सालाना कर दिया। पत्रकार लोगों ने इसे लोकतंत्र पर खतरा बताया और इस मामले को लड़ने के लिए "सुप्रीम कोर्ट" चले आए। ये अलग बात है कि कोर्ट को पता चल गया कि ये धंधेबाज पत्रकार हैं, लिहाजा कोर्ट ने राहत नहीं दी।

अच्छा पत्रकारों का ये गोरखधंधा जानकर आपको लग रहा है कि इसमें वही गली मोहल्ले छाप पत्रकार शामिल होंगे। माफ कीजिएगा ऐसा नहीं है। चलिए आप से ही एक सवाल पूछते हैं आप इलेक्ट्रानिक मीडिया में किस-किस चैनल का नाम जानते हैं ? मैं समझ गया कि आप किस - किस चैनल का नाम ले रहे हैं। राष्ट्रीय चैनल हो या फिर क्षेत्रीय,  हिंदी में हो या अंग्रेजी में, या फिर भोजपुरी में ही क्यों ना हो.. ज्यादातर चैनल के पत्रकार इस गोरखधंधे में बराबर के हिस्सेदार हैं। चैनल का नाम इसलिए पहले लिया कि आप सब जानते हैं कि टीवी चैनल के पत्रकारों का वेतन ठीक ठाक है, लेकिन बेईमानी के माल की बात ही कुछ और होती  है । चैनल का जब ये हाल है तो अखबारों के पत्रकार किस स्तर पर होर्डिंग्स के लिए मारा मारी कर रहे होंग, ये आसानी से समझा जा सकता है। वैसे वहां से छपने वाले अखबारों के पत्रकारों की ज्यादा मौज है, बाहर से आने वाले अखबार की कुछ कम है, लेकिन चोरी में वो भी शामिल हैं।

ऐसी ही शिकायत मिलने पर भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू ने बिहार की पत्रकारिता पर तीखा बयान देने के साथ ही तीन पत्रकारों की एक कमेटी बनाई और पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। बताते हैं कि पत्रकारों की ही कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना असंभव है। इस टीम ने नीतीश सरकार की तुलना आपातकाल से की है। कहा जा रहा है कि इमरजेंसी के दौरान स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जिस तरह सेंसरशिप लगी हुई थी, वही स्थिति इस समय नीतीश सरकार के कार्यकाल में भी है। आज बिहार में ज्यादातर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं। विज्ञापन के लालच में मीडिया संस्थानों को राज्य सरकार ने बुरी तरह अपने चंगुल में जकड़ रखा है। हालत ये है कि पत्रकार स्वतंत्र और निषपक्ष खबर लिख नहीं पा रहे हैं। बहरहाल प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने सुझाव दिया है कि विज्ञापन देने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए जो विज्ञापन जारी करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो, पर नीतीश इस सुझाव को भला क्यों मानेंगे ? अब समझ गए ना यही है नीतीश के सुशासन का असली और बदबूदार चेहरा !



Wednesday, 13 February 2013

नीतीश राज में मीडिया का कत्ल !

बिहार के नेताओं में कुछ तो समानता होगी ही ना । मुख्यमंत्री रहने के दौरान बिहार में लालू यादव अखबार वालों के साथ कैसा सुलूक करते थे, ये तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन दिल्ली में रेलमंत्री रहने के दौरान मैने देखा कि वो भी अपने खिलाफ अखबार में खबर देख कर भड़क जाते थे। जैसे नीतीश कुमार पर आरोप है कि वो सरकार के खिलाफ खबर लिखने वालों का विज्ञापन रोक देते हैं, ठीक वैसा ही लालू यादव के राज में रेल मंत्रालय में भी होता था। दिल्ली में भी बड़े-बड़े तुर्रम खां रिपोर्टर की हालत बेचारे जैसी बनी रहती थी। लिहाजा ज्यादातर अखबारी मित्रों ने हालात से समझौता कर लिया था। यही हालत आज बिहार में नीतीश कुमार की है। उनकी सरकार के खिलाफ जिसने भी अखबार रंगा, अगले दिन से उसका विज्ञापन रोक दिया जाता है, बस फिर क्या पूरा प्रबंधतंत्र सरकार के दरवाजे पर उल्टे सिर खड़ा दिखाई देता है। 

बिहार सरकार के खिलाफ ये आरोप मैं नहीं लगा रहा हूं, बल्कि प्रेस परिषद ने शिकायत के आधार पर एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। जांच कमेटी ने बकायदा महीने भर से भी ज्यादा समय तक विभिन्न पहलुओं पर जांच पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में जो कुछ कहा गया है वो नीतीश सरकार की असल तस्वीर दिखाने के लिए काफी है। बिहार सरकार पर आरोप लगा है कि राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करना अब कत्तई संभव नहीं है। यहां मीडिया को इमरजेंसी जैसी सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अखबारों का भविष्य खतरे में है, क्योंकि विज्ञापन का भय दिखाकर प्रेस को सरकार का अघोषित मुखपत्र बनाने की कोशिश हो रही है। इस स्थिति से उबरने के लिए जांच दल ने दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए विज्ञापन जारी करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी के गठन की वकालत की है।

प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू द्वारा बनाई गयी तथ्यान्वेषी समिति ने कहा है कि बिहार में अखबार सरकार के दबाव के चलते भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को कम तरजीह दे रहे हैं। प्रेस परिषद की समिति का कहना है कि बिहार में पूरा मीडिया उद्योग खासकर राज्य सरकार के विज्ञापनों पर निर्भर करता है क्योंकि औद्योगिक रूप से पिछड़ा होने के कारण यहां निजी विज्ञापनों का टोटा रहता है। रिपोर्ट में टीम ने कहा है कि उसने छोटे और मझोले अखबारों के प्रतिनिधियों तथा बड़े प्रकाशनों के संपादकों से मिलने के विशेष प्रयास किये। रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री की सैकड़ों गतिविधियों को बड़े अखबारों में प्रमुखता से छापा गया जो पत्रकारिता के मानकों पर न तो प्रासंगिक थीं और ना ही खबर लायक थी। रिपोर्ट में कहा गया है, इमरजेंसी के दिनों में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जैसी सेंसरशिप लगी हुई थी, वह स्थिति वर्तमान में नीतीश सरकार के कार्यकाल में देखने को मिल रही है।

रिपोर्ट जो खुलासा हुआ है, उससे नीतीश सरकार की असल तस्वीर देश के सामने आ गई है। समिति ने यहां तक कहा है कि मौजूदा हालात में ज्यादातर पत्रकार यहां घुटन महसूस कर रहे हैं। स्वतंत्रतापूर्वक काम करने में वह खुद को असहाय पा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी खौफ के चलते आंदोलन, प्रदर्शन, प्रशासन की कमियों को उजागर करने वाली और जनसमस्याओं से जुड़ी खबरों को अखबारों में स्थान  ही नहीं मिल पा रहा है। सरकार के दबाव के कारण भ्रष्टाचार उजागर करने वाली खबरों को जगह नहीं मिल पा रही है। कवरेज में विपक्ष की अनदेखी कर सत्तापक्ष की मनमाफिक खबरों को तरजीह देना पत्रकारों की मजबूरी बन गई है। जांच टीम ने यहां तक कहा है कि मीडिया के ऊपर इस तरह के अप्रत्यक्ष नियंत्रण से लोगों के सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित हो रहा है। इससे अनुच्छेद 19 [1] के तहत प्रदत्त संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।

रिपोर्ट में कुछ मजेदार बातें भी हैं। सूबे की सरकार जो खबर अखबार में छपवाने के लिए बेचैन रहती है, वो खबर पत्रकारों या संपादकीय विभाग को  ना भेज कर सीधे अखबार के प्रबंधन को दी जाती है। प्रबंधन ही संपादकीय विभाग पर दबाव बनाकर ये खबर प्रकाशित कराते हैं। समिति ने कहा, ‘‘सरकारी विज्ञापनों का लाभ उठाने वाले अखबारों के प्रबंधन लाभकारी संस्थानों के प्रति शुक्रगुजार रहते हैं और उनकी नीतियों की तारीफ करते हैं।’’ समिति के अनुसार अनेक पत्रकारों ने टीम के सदस्यों को फोन करके इस संबंध में अपनी दिलचस्पी दिखाई लेकिन दबाव के चलते नाम नहीं जाहिर करने का भी अनुरोध किया। बताइये क्या हाल हो गया है वहां बेचारे पत्रकारों का। 

रिपोर्ट के अनुसार अनेक पत्रकारों ने किसी कथित घोटाले से जुड़ी खबर के प्रकाशन के चलते वरिष्ठ दर्जे के पत्रकारों के स्थानांतरण का भी जिक्र किया। पीसीआई के दल ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सिफारिशें भी की हैं। दल ने सुझाव दिया है कि बिहार सरकार को प्रदेश में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सकारात्मक माहौल बनाना चाहिए और पत्रकारों के खिलाफ लंबित सभी मामलों की समीक्षा एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग द्वारा की जानी चाहिए। समिति ने सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी आग्रह किया है। समिति की रिपोर्ट से ये साफ हो गया है कि सूबे की सरकार अखबारों के जरिए बिहार की जो तस्वीर देश को दिखा रही है, दरअसल वो सही नहीं है। असल तस्वीर कुछ और ही है, यानि भयावह और डरावनी है।

अब नीतीश सरकार पर ये आरोप किसी विरोधी दल ने लगाया होता तो कहा जाता कि विपक्ष का काम ही है सरकार का विरोध करना। लेकिन ये आरोप तो प्रेस परिषद ने लगाया है। वैसे इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद भला लालू कहां चूकते, उन्होंने अपने ही अंदाज में कह दिया कि सरकार के लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। चलिए लालू का सुझाव सरकार तक पहुंच जाएगी, लेकिन लालू जी दिल्ली में रेल मंत्रालय में बैठकर आप क्या करते थे, पता नहीं आपको याद भी है या नहीं। नहीं याद है तो मैं बता देता हूं। आप भी कमोवेश यही काम करते थे, लेकिन आपके चंगुल में सिर्फ अखबार का प्रबंधन भर नहीं था, तमाम पत्रकार भी आपके हां में हां मिलाते रहे और आप उन्हें रेल का फ्री पास देकर खुश कर दिया करते थे। 

बहरहाल इस रिपोर्ट के बाद मुझे लगता है कि अब बिहार में इलेक्ट्रानिक मीडिया को मोर्चा संभालना चाहिए, क्योंकि कम से कम इलेक्ट्रानिक मीडिया को बिहार सरकार के विज्ञापन की उतनी जरूरत बिल्कुल नहीं है, जितनी प्रिंट को है। मैं काफी समय तक प्रिंट में रह चुका हूं, इसलिए मुझे पता है कि बिहार में अखबार बगैर सरकारी विज्ञापन के वाकई नहीं निकल सकते। मैं अगर बिहार को उद्योग शून्य कहूं तो गलत नहीं होगा, मुझे नहीं लगता है कि वहां कोई भी ऐसा उद्योग है जो साल में एक बार भी पूरे पेज का विज्ञापन दे सकने की क्षमता रखता हो। अगर जनता की अखबार की जरूरत पूरी करनी है तो विज्ञापन चाहिए और विज्ञापन के लिए अगर सरकार इस हद तक नीचे गिरती है तो प्रबंधन के सामने दो ही रास्ता है या तो वो सरकार से समझौता करे या फिर अखबार को बंद कर दिया जाए। एक  अखबार के बंद होने का मतलब आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि इससे हजारों लोगों की रोजी रोटी जुडी होती है। लिहाजा मैं तो कहूंगा कि इलैक्ट्रानिक मीडिया कम से कम नीतीश का असली चेहरा देश के सामने लाए।