आजकल छोटे पर्दे पर दर्शकों को अपनी ओर खींचने के लिए ऐसी गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो गई है, जिसे कभी जायज नहीं ठहराया जा सकता। एक मनोरंजक चैनल ने तो छोटे पर्दे को क्रिकेट का मैदान ही बना दिया है। वजह आप सबको पता है, क्रिकेट मैच के दौरान बाजार सूने हो जाते हैं, स्कूल कालेज में छात्रों की संख्या काफी कम रह जाती है, सरकारी दफ्तर तक वीरान नजर आने लगते हैं, क्योंकि सभी लोग टीवी के सामने जम जाते हैं। सब अपने दुश्मन देश को हारता हुआ देखना चाहते हैं। अब देखिए ना दावा तो ये किया जाता है कि सांस्कृतिक गतिविधियों के आदान प्रदान से भारत और पाकिस्तान की आवाम करीब आएगी, लेकिन गायन प्रतियोगिता के मंच सुर-क्षेत्र से तो आवाम कभी करीब आ ही नहीं सकती। सच ये है कि ऐसे कार्यक्रम दोनों देशों में सौहार्द के बजाए जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इस प्रोग्राम का जो फारमेट तैयार किया गया है वो लोगों के सेंटीमेंट को भड़काने वाला है।
आइये पहले इसके फारमेट पर ही चर्चा कर लेते हैं। इसमें भारत और पाकिस्तानी गायकों की टीम है और इस टीम अलग अलग कप्तान हैं। पाकिस्तानी गायकों का कप्तान वहां के संगीतकार, अभिनेता व गायक आतिफ असलम को बनाया गया है जबकि भारतीय गायकों के कप्तानी हिमेश रेशमियां निभा रहे हैं। ये दोनों इस शो में शुरुआती जहर घोलते हैं। उसके बाद इस जहर को और तीखा बनाने के काम को अंजाम देती है जजों की पैनल। जिसमें शामिल हैं पाकिस्तानी गायिका आबिदा परवीन, बांग्लादेशी गायिका रुना लैला और भारतीय पार्श्वगायिका आशा भोसले।
मैं आज ही इस प्रतियोगिता के परिणामों का हश्र बता देता हूं। होगा ये कि इसके बाद दोनों देशों में गाने को लेकर इतना विवाद बढ जाएगा कि कलाकार जो आज एक दूसरे के देशों मे जाते हैं और फिल्मों के साथ ही स्टेज शो करके लोगों का दिल जीतते हैं। आने वाले दिनों में ये प्रक्रिया थम जाएगी। पाकिस्तानी कलाकार यहां नफरत की नजर से देखे जाएंगे और भारतीय गायकों वहां जिल्लत का सामना करना पडेगा। इस शो का मकसद अगर भाईचार बढ़ाना होता तो पाकिस्तानी गायकों का कप्तान हिमेश को बनाया जाता और भारतीय गायकों का कप्तान आतिफ को बनाया जाना चाहिए था। ऐसे में जब पाकिस्तान के आतिफ अगर भारतीय गायकों का और हिमेश पाकिस्तानी गायकों का पक्ष लेते नजर आते तो एक बार जरूर देश में सकारात्मक संदेश जाता।
मैं पाकिस्तानी गायिका आबिदा परवीन को सुनता हूं, उनकी गायकी मुझे पसंद है। अब आप ये मत पूछ लीजिएगा कि कौन सा सुर पसंद है। सच कहूं तो मुझे सुर - उर की कोई जानकारी नहीं है, लेकिन तीनों जज यानि आशा भोसले, आबिदा परवीन और रुना लैला को तो सुर की जानकारी होगी ना। अब ऐसा कैसे हो सकता है कि एक प्रतियोगी गाना गाए उसमें एक जज का फैसला आए कि गाना सुर में था और दूसरा उसी गाने को बेसुरा बता दे। ऐसे में इतना तो तय है कि या तो एक जज को सुर का ज्ञान नहीं है, या फिर वो जाति, धर्म, भाषा, देश के आधार पर भेदभाव कर रहा है।
मैं आज यानि (14 अक्टूबर) की बात करूं। दिन में सुर क्षेत्र देख रहा था। एक पाकिस्तानी गायक को आशा भोसले और बांग्लादेशी गायक रुना लैला दोनों ने " जीरो " मार्क्स दिए। दोनों ने अपने कमेंट में साफ किया कि गाना सुर में नहीं था, चूंकि प्रतियोगिता का नाम ही सुर क्षेत्र है, लिहाजा सुर से तो किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन आबिदा परवीन ने उसे पूरे 10 मार्क्स दे दिए। अब सवाल उठता है कि गाना या तो सुर में था या नहीं था। अगर आशा भोसले और रुना लैला को गाना बेसुरा लगा तो आबिदा को गाने में सुर कहां से नजर आ गया? किसी को भी ये बात समझने में देर नहीं लगी कि गायक प्रतियोगी उनके मुल्क का है। ऐसे में सुर गया तेल लेने। आबिदा ने उसे पूरे 10 नंबर दे दिए, हालाकि इस पर सवाल भी उठा, तो उन्होंने कहा कि माइक की गड़बड़ी से ऐसा हो सकता है कि उसका सुर गया हो, लेकिन पाकिस्तानी गायक ने बढिया गाया। आशा भोसले की आपत्ति को भी उन्होंने यही कह कर खारिज कर दिया।
दरअसल इस शो का फार्मेट ऐसा है कि इसमें गायकी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, हर शो में इंडिया या पाकिस्तान का जो विजेता होता है, उसे ट्राफी दी जाती है। देखने से ही लगता है इस शो का मकसद कुछ और नहीं बल्कि इंडिया और पाकिस्तान के नाम पर ज्यादा से ज्यादा दर्शक (यानि टीआरपी) इकट्ठा करना है। सच बताऊं तो जब भी प्रतियोगी गाने के लिए आता है तो दर्शकों को लगता है कि कितनी जल्दी ये गाना बंद करे, जिससे वे कैप्टन और जजों की नूरा कुश्ती सुन सकें। आतिफ और हिमेश जिस अंदाज मैं बैठते हैं, लगता है कि ये कब एक दूसरे का कालर पकड़ लेगें। ना आपस में कोई संवाद, ना चेहरे पर कोई भाव, दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बन कर यहां बैठते हैं। फिर कहा जाता है कि हम पाकिस्तान के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान कर रहे हैं।
मुझे नहीं पता कि ये पाकिस्तानी कैप्टन आतिफ अपने मुल्क का कितना बड़ा कलाकार है, गायक है, अभिनेता है, मैं तो इसी सुर क्षेत्र के मंच पर इन्हें देख रहा हूं। हैरानी तब होती जब ये आशा भोसले के जजमेंट पर उंगली उठाता है और उसका लहजा भी सड़क छाप लफंगे जैसा होता है। बेचारी आशा भोसले को ये कहना पड़ता है कि " शायद मैं इस जज की कुर्सी के काबिल नहीं हूं " । कई बार तो ऐसी बेहूदा बातें की जाती हैं, जिससे आशा ताई का चेहरा रुंआसा हो जाता है। कैप्टन आतिफ ने एक शो में जब हर जजमेंट पर उंगली उठाना शुरू किया तो आशा ताई को कहना पड़ा कि " गाने के मामले में मैं मर भी जाऊं तो झूठ नहीं बोल सकती "। आपको पता है कि आशा ताई तब से फिल्मों में और देश विदेश में गा रही हैं, जब आतिफ पैदा भी नहीं हुआ होगा। आतिफ की उम्र 40- 45 साल के करीब है और आशा ताई को गाना गाते हुए 40- 45 साल हो गए। इसके बाद भी आतिफ का व्यवहार आपत्तिजनक है।
कुरुक्षेत्र बन चुका सुर-क्षेत्र आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के बीच खाई को और चौड़ा करने वाला है। जिस तरह से भारत और पाकिस्तान के बीच इन दिनों क्रिकेट के मैच बंद है, सुर क्षेत्र में इसी तरह का माहौल रहा तो कलाकारों का भी एक दूसरे के देश में जाना जल्दी बंद हो जाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच जमीनी सरहदों को ख़त्म करने का ये प्रयास यूं ही दम तोड़ देगा। ऐसे में जल्दी ही इसका फार्मेट बदलकर ऐसा किया जाना चाहिए, जिससे कम से कम शो से भाईचारे का संदेश तो लोगो में जाए ही। शो के स्टेज पर दोनों देशों के बीच हर जगह दूरी बनाने की बात है। अब देखिए गायक मंच पर आते हैं तो अपने अपने देश के स्टैड से माइक उठाते हैं, माइक भी वो एक जगह से नहीं लेते हैं। सुरक्षेत्र के माइक से आग निकलता रहता है, इसका मतलब तो मुझे आज तक समझ में नहीं आया।
सुर-क्षेत्र को जीरो मार्क्स...
इस शो की रेटिंग अगर मुझे करनी हो तो मैं इसे जीरो मार्क्स दूंगा। जीरो देने की वजह है। दरअसल इस शो में ही ऐसा है कि या तो कलाकार सुर में गाता है, या फिर बेसुरा है। मतलब या तो उसे जज पूरे 10 नंबर देते हैं या फिर जीरो। ये कैसा न्याय है, अगर किसी ने मामूली गल्ती की है तो एक मार्क्स काट कर उसे 9 दिया जाना चाहिए। पर यहां ऐसा नहीं है। प्रतियोगी को या तो 10 मार्क्स मिलते हैं या फिर जीरो। ऐसे में अगर मुझे इस शो को मार्क्स देने हों तो बिना सोचे समझे मैं भी जीरो दे दूंगा।


