Thursday, 29 August 2013

हां मैं दे रहा हूं "सत्याग्रह" को फुल मार्क्स !

फिल्म सत्याग्रह जिसमें आपको " स्टार के झुंड " दिखाई देगें। ये फिल्म रिलीज तो 30 अगस्त यानि कल होगी, लेकिन मैं फिल्म के रिलीज होने के एक दिन पहले ही इसकी समीक्षा कर दे रहा हूं, वरना कल तो आपको फिल्मों की समीक्षा करने वाले गुमराह कर देगें। वजह अब समीक्षा फिल्म देखकर उसकी गुणवत्ता के आधार पर तो की नहीं जाती, बल्कि फिल्म के निर्माता, निर्देशक और कलाकारों से संबंधों के आधार पर उसे नंबर दिए जाने लगे हैं। अब फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं तो किसी समीक्षक की हैसियत ही नहीं है कि फिल्म को खराब नंबर दे, लेकिन फिल्म के प्रमोशन में भेदभाव को लेकर कुछ चैनलों में जरूर नाराजगी है। देखिए टीवी चैनल का फार्मूला हे, सबसे पहले और फिल्म का सबसे बड़ा कलाकार उसके ही स्टूडियो में होना चाहिए। जाहिर है जहां अमिताभ बच्चन सबसे पहले गए होंगे, वहां सत्याग्रह को अच्छे नंबर मिलेगे, जहां बाद में गए होंगे, वहां कुछ नंबर तो कटेगा ही। जहां नहीं गए होंगे वहां क्या होगा, ये आसानी से समझा जा सकता है। हालाकि मैने अभी पिक्चर नहीं देखी है और कल रिलीज हो रही इस पिक्चर को देखने का समय भी मेरे पास नहीं है, फिर भी मैं आज ही इसे पांच में पांच यानि फुल मार्क्स दे रहा हूं। अब आप कह सकते हैं कि ये तो बेईमानी है, तो मेरा आपसे सवाल है, जब पिक्चर रिलीज हुए बगैर फिल्म के निर्माता प्रकाश झा ने ताल ठोक कर कह दिया कि उनकी फिल्म " सत्याग्रह " एक हजार का कारोबार करेगी और सब लोग खामोश हैं, तो मेरे फुल मार्क्स देने पर भला आप कैसे हल्ला कर सकते हैं ?

वैसे ईमानदारी की बात बताऊं ! अमिताभ बच्चन जैसा महानायक कई हजार साल बाद पैदा होता है। मैं तो अपने को खुदनसीब मानता हूं कि उनकी पिक्चरों को देखते हुए बड़ा हुआ हूं। अब ये अलग बात है कि मेरे पैदा होने के तीन साल बाद ही यानि 1969 में ही अमिताभ बच्चन ने सात हिंदुस्तानी से फिल्मों की शुरुआत कर दी, लेकिन उनका अच्छा समय तब आया जब मैं फिल्मों को कुछ जानने समझने लगा। यानि 1973-74 के बाद से। अब तक अमिताभ को देख रहा हूं। मेरे जेहन में ऐसा कोई किरदार नजर नहीं आता है जो अमिताभ ने ना निभाया हो। अमिताभ के फिल्मों को मैं क्या गिनाऊं, बच्चा बच्चा जानता है। उस दौर में आज की तरह मीडिया भी नहीं थी, जो बताती कि ये पिक्चर बहुत अच्छी है और ये बहुत बुरी। अमिताभ उस दौर के कलाकार हैं, जब उनके बोले गए डायलाग देश और दुनिया में बच्चा-बच्चा बोलता रहता था। आज फिल्मों को बढिया बताने के लिेए मीडिया ने अलग ही पैमाना तैयार कर लिया है। फलां फिल्म सौ करोड़ के क्लब मे शामिल हो गई, फलां फिल्म ने दो सौ करोड़ कमाए। ये अलग बात है कि 200 करोड कमाने वाली फिल्म को लोग गाली दे रहे हैं। बहरहाल अमिताभ की हर आने वाली पिक्चर को इसलिए भी देखना जरूरी है ताकि अमिताभ बच्चन के बनाए जा रहे फिल्मी इतिहास के हम भी गवाह रहें। आने वाली पीढी के सामने गर्व से कह सकें कि पिक्चर तो हमारे जमाने में बनती थी। बताइये अब अगर हम इस पिक्चर को पांच में पांच दे रहे हैं तो इसमें क्या गलत है।

अच्छा सत्याग्रह तो इसलिए भी देखना जरूरी है कि यहां स्टार नहीं स्टारों को पूरा झुंड है और सभी एक से बढ़कर एक। अमिताभ को छोड़ भी दें तो क्या आप अजय देवगन को नहीं देखने जाएंगे, मनोज वाजपेयी पर दांव नहीं लगाएंगे। फिर करीना को भी छोड़ देंगे क्या ? इसके अलावा अमृता राव, अर्जुन रामपाल की क्या बात है ? वैसे मल्टीस्टार को लेकर फिल्म बनाई गई है, लेकिन पूरी कहानी करीना के ही इर्द गिर्द घूमती रहती है। मेरे लिए करीना को देखना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि फिल्म में वो एक तेजतर्रार टीवी जर्नलिस्ट है। मैं देखना चाहता हूं कि जर्नलिस्ट जिस तरह की मुश्किलों से दो-चार होते हैं, प्रकाश झा वहां तक पहुंच पाए भी हैं या नहीं। वैसे तो करीना सत्याग्रह कर रहे लोगों की आवाज को दूर दूर तक पहुंचाने और लोगों को जगाने का काम कर रही है। अगर मैं कहूं कि करीना की रिपोर्ट की वजह से ही ये आंदोलन इतना बड़ा हो गया तो गलत नहीं होगा। फिल्म रिलीज तो कल होगी, लेकिन सत्याग्रह को लेकर कुछ विवादों की चर्चा टीवी चैनलों से शुरू होकर राजनीतिक गलियारे तक पहुंच गई है। कहा जा रहा है कि ये फिल्म बापू के सत्याग्रह पर नहीं बल्कि अन्ना के सत्याग्रह पर आधारित है। ये भी कहा जा रहा है कि देश में फैले भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह से अन्ना ने अपने आंदोलन के जरिए सरकार को हिला दिया और पूरे देश को तिरंगे के नीचे ला खड़ा किया, कुछ ऐसी कहानी सत्याग्रह की है। भ्रष्ट व्यवस्था पर चोट करते हुए अमिताभ की आक्रामक अदाकारी पर निश्चित ही सिनेमा हाल तालियां की गडगड़ाहट से गूंज उठेगा। 

हालाकि जो इस फिल्म की यूएसपी है, बेचारे निर्माता निदेशक उसी से हाथ झाड़ते नजर आ रहे हैं। मेरे ख्याल से तो उन्हें तो ठोक कर कहना चाहिए था कि हां इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई गई है, अन्ना के आंदोलन से भी फिल्म प्रभावित है। पर उन्हें लगता है कि मीडिया ने अगर इस फिल्म को अन्ना आंदोलन से जोड़कर प्रचारित करना शुरू किया तो कहीं सरकार और संसद के कान ना खड़े हो जाएं और बेवजह फिल्म संकट में पड़ जाए। इसलिए लगभग सभी टीवी चैनलों पर फिल्म के प्रमोशन के दौरान प्रकाश झा ने साफ कहाकि यह फिल्म कहीं से भी अन्ना आंदोलन से प्रभावित नहीं है। सफाई देते हुए उन्होंने यहां तक कहा कि इस फिल्म कहानी तो फिल्म "राजनीति" के साथ ही लिखी जा चुकी थी। वैसे हम सब जानते हैं कि अमिताभ किसी तरह भी राजनीति में हिस्सा नहीं लेते हैं, वो सिर्फ फिल्म में एक किरदार निभा रहे हैं। लेकिन इस समय गांधी परिवार से उनकी थोड़ी दूरी बनी हुई है, इसलिए वो भी नहीं चाहते कि बेवजह मामले को तूल दिया जाए।  वैसे तो अगर बात सिर्फ अन्ना की होती तो मुझे नहीं लगता कि अमिताभ या प्रकाश झा को ये कहने में कोई दिक्कत होती कि फिल्म इसी आंदोलन से प्रभावित है। मुश्किल ये है कि इस आंदोलन में कुछ ऐसे बदजुबान लोग थे, जिन्होंने मर्यादाओं को ताख पर रख दिया और गाली गलौज की भाषा शुरू की। यही वजह है कि आंदोलन भी बिखर गया। बहरहाल अमिताभ और प्रकाश कुछ भी दावा करें, लेकिन मेरा तो मानना है कि ये फिल्म निर्भया (मामले), महात्मा गांधी और अन्ना हजारे की याद जरूर दिलाएगी।
  
हां भाई ! आजकल सनीमा में गाना - बजाना पर भी बहुत जोर होता है। जानते हैं, ठंडा- ठुंडी गाना भी लोग पसंद नहीं करते। दर्शकों का चाहिए आयटम सांग। अब देखिए भ्रष्टाचार और अन्ना आंदोलन से प्रेरित फिल्म में भला आयटम सांग का क्या मतलब ? लेकिन नहीं साहब आयटम का तड़का ही तो फिल्म को आजकल सुपर डुपर बनाता है। इसीलिए अब इस फिल्म में ‘अय्यो जी हमरी अटरिया में’ जैसा आयटम सांग शामिल कर दिया गया है। फिल्म में आयटम सांग जोड़े जाने की बात पर सफाई देते हुए प्रकाश झा कहते हैं कि यह गीत भ्रष्ट लोगों के मनोविज्ञान को समझने में मददगार होगा। ‘सत्याग्रह’ में यह गाना भ्रष्ट लोगों के दबदबे और उनकी मिली भगत का माहौल दिखाएगा। इसीलिए गाने के बोल जानबूझ कर व्यंग्य वाले रखे गए हैं। इस गाने में मॉडल नताशा के साथ फिल्म में लीड रोल कर रहे अजय देवगन की भी एक झलक दिखेगी। हां एक अच्छी बात और , सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अपनी मधुर आवाज का जादू बिखेरेगें। इसमें वो एक भजन गा रहे हैं। अमिताभ भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक व्यक्ति के किरदार को पर्दे पर साकार कर रहे हैं। इसलिए ‘रघुपति राघव राजा राम’ को अपनी सुमधुर आवाज देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं।

अब आखिरी बात ! फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई, लेकिन इस बात पर जरूर बहस शुरू हो गई है कि ये फिल्म कमाई कितना करेगी। सलमान की दबंग ने सौ करोड की कमाई की तो पूरी इंडस्टी में हल्ला मच गया। सलमान का जवाब दिया शाहरुख ने चेन्नई एक्सप्रेस से। उनकी फिल्म ने दो सौ करोड की कमाई की। हांलाकि चेन्नई एक्सप्रेस की कमाई की वजह कुछ और भी है। पहला तो ये कि फिल्म फेस्टिव सीजन पर रिलीज हुई, इसके अलावा रिलीज होने के दौरान काफी छुट्टियां रहीं, जिसकी वजह से फिल्म ने कमाई तो बेहतर की, लेकिन पैसे के साथ जो गाली मिल रही है, शायद शाहरुख खान के पास उस गाली का कोई एकाउंट नहीं है। मतलब चेन्नई एक्सप्रेस पर लोग हंसते हुए सवार तो हुए लेकिन रोते हुए उतरे। उन्हें लगा कि इस एक्सप्रेस में उनकी जेब कट गई। वैसे सच कहूं कि जब आजकल फिल्मों की कामयाबी का पैमाना उसकी कमाई से है, तो मुझे लगता है कि सत्याग्रह वाकई रिकार्ड तोड़ देगी। बहरहाल प्रकाश झा ने एक हजार करोड़ कमाई की बात की है, चलिए उनको शुभकामनाएं दे रहा हूं, लेकिन हां मुझे लगता है कि फिल्म देखकर कम से कम दर्शक गाली देते हुए सिनेमा हाल से बाहर नहीं आएंगे। बाकी कल देखिए पिक्चर !






20 comments:

  1. अच्छी समीक्षा, देखकर आते हैं।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  3. ab to film dekhana hi padegi ...

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  4. बढिया समीक्षा..जरुर देखेंगे..

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार 30/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः9 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज शुक्रवार (30-08-2013) को राज कोई खुला या खुली बात की : चर्चा मंच 1353में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. बढ़िया नाप दिया समीक्षकों को। सच बोलने से लोग सच दिखाके भी डरते हैं क्या ज़माना आ गया है प्रकाश झा साहब जी।

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    1. आज कल की समीक्षा भी प्रायोजित होती है..

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  8. हमको तो फिल्मों को लेकर इतनी उत्सुकता नहीं रहती है !

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    1. कोई बात नहीं, सबकी अपनी- अपनी रुचि है

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  9. आप की समीक्षा और बातों से सहमत हूँ ...देखने की कोशिश कर सकता हूँ ...बस !
    शुभकामनायें!

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  10. एक अलग शैली की समीक्षा जिसमें कहाँ आप तारीफ कर रहे हैं कहाँ व्यंग्य एकदम साफ नही है । यही है इसकी विशिष्टता । आपने सही कहा झा ,बच्चन और देवगन के नाम पर फिल्म देखी जा सकती है ।

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    1. हाहाहा, प्रणाम
      बहुत बहुत आभार

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