Tuesday, 24 June 2014

टीवी चैनल संपादक की काली करतूत !

मैं आठ साल तक राष्ट्रीय चैनल  IBN 7  से जुड़ा रहा हूं। इस दौरान चैनल ने तमाम बड़े- बड़े आयोजन किए । इन आयोजनों में केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री, विभिन्न राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय नेता , सांसद, विधायक शामिल होते रहे हैं। मैने कभी नहीं सुना कि किसी कार्यक्रम में अतिथि बनने या फिर शामिल होने के लिए  किसी ने पैसे की मांग की हो। जब  भी नेताओं के पास निमंत्रण पत्र गया, नेताओं ने अपने सहायक से महज इतनी जानकारी की कि उस तारीख को पहले से कोई कार्यक्रम तय तो नहीं है, अगर तय होता है तो राजनेताओं ने कार्यक्रम के कामयाब होने की शुभकामना दी और कहाकि पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम में व्यस्त  होने की वजह से वो  कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले सकते। लेकिन अब दिल्ली में नई सरकार बनने के बाद एक विचित्र बात सुनी जा रही है। ये बात बताऊंगा, लेकिन पहले चैनल, चैनल  के मालिक और चैनल के संपादक के बारे में चर्चा करता हूं, फिर बताता हूं कि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मंत्री और सांसद के रेट क्या हैं  ?

एक चैनल के मालिकान दिल्ली में आयोजन करना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि इस आयोजन में केंद्र सरकार के बड़े से बड़े मंत्री, सांसद और सत्ता में उच्च पदों पर आसीन नौकरशाह के अलावा विभिन्न जांच एजेंसियों के अफसर भी शामिल  हों। दरअसल चैनल के मालिकों के दिन कुछ खराब चल रहे हैं। वैसे तो पैसे वाले हैं, पर कारोबार में नंबर दो का  माल ज्यादा है। मालिकों के साथ कई मीटिंग  में मैं शामिल  रहा हूं, बहुत ऊंची -ऊंची बातें करते हैं,  चैनल के लिए जिस चीज की मांग हुई तत्काल पूरा करने को कह दिया जाता है । हैरानी तब हुई जब एक रात 11.30 बजे शुरू होकर सुबह पांच बजे खत्म हुई मीटिंग में   चैनल  के विस्तार पर करीब हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी गई । लेकिन हकीकत ये है कि तीन महीने बीत जाने के बाद 10 करोड़ भी खर्च नहीं किया गया। बहरहाल  मीडिया के मुंगेरीलाल ने ऐसा हसीन सपना दिखाया कि हम सब  चैनल को लेकर हवा  में उडने लगे , लेकिन मालिक का एजेंडा साफ है। चैनल उनकी  प्राथमिकता  में ही नहीं है,, चैनल  की आड में  दो नंबर का कारोबार फलता फूलता रहे,  बस चैनल हो , मैग्जीन हो या फिर अखबार सब का  मकसद सिर्फ इतना ही है।

अब यहां पहले जितने भी संपादक रहे, उनकी माडिया में एक पहचान रही है, ये नाम जितना देश में जाने जाते है,  उतना ही विदेशों में भी लोग जानते हैं।  पर जैसे ही इन संपादकों ने मालिक का असली चेहरा देखा वो चुपचाप यहां से खिसक गए।  लेकिन इस संपादक की बात ही निराली है। पता चला है कि एक बार यहां से निकाले जा चुके हैं। निकाले जाने की वजह जानकर तो मैं भी सन्न रह गया। दरअसल दो नंबर का पैसे को ठिकाने लगाया जाना था, काफी मात्रा में पैसा था, लिहाजा मालिक ने कुछ करोड़ रुपये माननीय संपादक के घर रखवा दिया। लेकिन जब पैसा संपादक के घर से वापस आया तो ये पैसा काफी  हलका हो चुका था। इससे मालिक की नजर में इस संपादक पर टेढ़ी हो गई और कुछ दिन बाद इनकी छुट्टी भी कर दी गई। चैनल से बाहर होने के बाद भी मालिक और उनके परिवार से चिपके रहे। चैनल के मालिक के यहां बर्थडे पार्टी भी हो, तो बेचारे संपादक कोट पहन कर पहुंच जाते , कोट का जिक्र इसलिए कि उन्हें लगता है कि कोट पहनने से वो पढ़े लिखे दिखते हैं। हाहाहा.. पर बेचारे की गलत फहमी है।

बहरहाल यहां से निकाले जाने के बाद इस संपादक को एक दो जगह कुर्सी मिली पर वहां के मालिक भी महीने भर से ज्यादा इन्हें बर्दास्त नहीं कर पाए। इस बीच संपादक की पत्नी  ने चैनल की मालकिन से दोस्ती कर ली और फोन पर गपबाजी करने लगी। वैसे संपादक की पत्नी का लगातार फोन करना चैनल की मालकिन को अच्छा नहीं लगता था। एक दो बार तो ऐसा भी हुआ कि हम सब मीटिंग में थे और इनका फोन आ गया, मालकिन ने बहुत गंदा सा मुंह बनाया, फिर चपरासी को फोन थमाकर कहा ... बाहर जाकर बता दो कि मैं बिजी हूं। खैर ये उनका अपना मामला है, लेकिन सच ये है कि दुबारा नौकरी दिलाने में संपादक की पत्नी का बड़ा हाथ रहा, क्योंकि उन्होंने ही सौदे की डील की। सब को पता है कि बेचारे  संपादक  के पास  कोई नौकरी नहीं थी, पहले एक बड़े ब्रांड में थे,  तो दो चार नेता इसका नाम जानते थे। वहां से निकाले गए तो सड़क पर ही आ गए। अब कोई दो पैसे को नहीं पूछ  रहा।  इस बीच सड़क पर घूम रहे संपादक ने देखा कि मालिक  की भी फंसी हुई है.  लिहाजा इस समय तो  मालिक को दल्ला टाइप संपादक की जरूरत होगी, जो केंद्र की सरकार में घुसपैठ कर दो नंबर के धंधे को जारी रखने में मददगार साबित हो सके। फिर क्या था, दोनो हाथ जोड़े पहुंच गए मालिक के दरवाजे पर ..।    इसने  चैनल के मालिकों  को भरोसा दिलाया  कि  वो सत्ता के गलियारे के सबसे बड़े फिक्सर हैं, कोई भी मंत्री, पार्टी नेता  उनके  उंगली के इशारे पर नाचता हुआ उनके पास चला आएगा।

मालिक को लगा कि नई - नई सरकार बनी है, क्यों ना एक छोटा सा आयोजन रख मंत्रियों को यहां बुलाया जाए । थोड़ा मंत्रियों के साथ खाना  " पीना " हो जाएगा,  जिससे मुश्किल में मंत्रियों का सहारा मिल सके। फिर चैनल  मालिक को लगा कि लगे हाथ अपने फिक्सर संपादक की औकात भी पता  चल जाएगी। बस फिर क्या ! जून महीने की तारीख तय कर ली गई, संपादक को कहा गया कि अब वो बीजेपी के सांसद और मंत्रियों का जुगाड़ करें।  ये तो संपादक के लिए  सिर मुड़ाते  ही ओले पड़ने वाली बात हो गई । अब दिल्ली के सियासी गलियारे की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है, साफ सुथरे छवि वाले लोग मंत्री बन चुके हैं।   पहले तो इस बिगडैल संपादक ने खुद कोशिश की कि किसी मंत्री से मिलने का समय मिल जाए, लेकिन समय मिलना तो दूर इसका फोन भी किसी ने नहीं उठाया । हालत ये हुई कि इस संपादक ने एक  नामचीन पत्रकार के नाम को भुनाने की कोशिश की, लेकिन ये दांव भी नहीं चला। केबिनेट मंत्री तो दूर किसी राज्यमंत्री ने भी इसे मिलने का समय नहीं दिया। एक मंत्री ने संपादक को दो घंटे तक बाहर बैठाए रखा, फिर भी मिलने से इनकार कर कहाकि उसके पास समय नहीं है । बेचारे संपादक बेआबरू होकर किसी तरह आफिस आए, यहां अपने रिपोर्टरों से ही मुंह छिपाते फिर रहे थे।

संपादक ने सबसे घटिया खेल अब शुरू किया। उसने मालिक से कहाकि " देखिए राजनीति में बहुत गिरावट आ गई है, अब ये कमीने मंत्री और नेता किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पैसे की मांग कर रहे हैं। अब मालिक की तो फंसी हुई है, उसे तो पूरा कारोबार मैनेज करना है, इसलिए तुरंत कह दिया है, हां क्यों नहीं ! अगर कार्यक्रम में आने के लिए पैसा मांगते हैं तो कोई बात नहीं,  उन्हें बुलाइये, हम तो जाते समय भी उनकी बिदाई पैसों से करने को तैयार हैं। पता है संपादक  ने क्या रेट बताया ?  सांसद 10 लाख, राज्यमंत्री 15 लाख और केबिनेट मंत्री  20 लाख । मालिक ने पूछा कि पैसे लेने के बाद कार्यक्रम में आएंगे ही, इसकी गारंटी क्या है ? संपादक ने साफ कर दिया कि इसकी कोई गारंटी नहीं है, हमें तो बस  उनकी  बातों पर भरोसा ही करना होगा। अब मालिक क्या करे, उसके लिए तो एक तरफ कुआं और दूसरी ओर खाई है। इस संपादक से दुश्मनी भी नहीं ले सकता, क्योंकि ये सिर्फ संपादक नहीं बल्कि उसका पार्टनर कहें तो गलत नहीं होगा,  क्योंकि संपादक नंबर दो का पैसा कई बार अपने चैंबर में मंगाता है और यहीं इस रकम कि  गिनती वगैरह होती है।  अब देखिए ना संपादक की चाल... आयोजन तो हुआ नहीं, लेकिन  चैनल का मालिक लगभग 50 लाख रुपये से हलका हो गया। बताया गया कि पांच मंत्री  को  पैसा पहुंचाया  जा चुका था... हाहाहाहा पहली पारी में ये संपादक मालिक को मोटा चूना लगा चुका है, एक बार फिर लूटने का पुख्ता इंतजाम कर चुका है। सवाल ये है कि क्या इसीलिए इस संपादक  का ध्यान खबरों के बजाएं  " मोटे माल " पर अधिक है ?



Sunday, 13 April 2014

राहुल का इंटरव्यू नहीं राष्ट्र के नाम संदेश !

हिंदी के दो बड़े न्यूज चैनलों ने कल कुछ बड़ा करने का दावा किया । वजह देश में हिंदी का नंबर एक चैनल होने का दावा करने वाले " आज तक " को  राहुल गांधी का इंटरव्यू मिल गया और बहुत लंबे समय तक नंबर एक रहे चैनल "इंडिया टीवी" को नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू मिला। राहुल ने इटरव्यू अपने घर के गार्डेन में दिया, जबकि मोदी चैनल के स्टूडियो पहुंचे थे। अब इंटरव्यू मिलने के बाद दोनों ही चैनल आपे से बाहर हो गए। इस इंटरव्यू को बेचने के लिए आज तक ने तो हद ही कर दी। चैनल पर कहा गया कि पिछले 10 साल का सबसे बड़ा इंटरव्यू.. वो भी हिंदी में। इंडिया टीवी ने इंटरव्यू के कुछ टुकडे 48 घंटे पहले दिखाना शुरू किया और बताता रहा कि पूरा इंटरव्यू शनिवार को रात में देखिए। वैसे हम कह सकते हैं कि इंडिया टीवी थोड़ा संयम में जरूर रहा। बहरहाल वीकेंड में आमतौर पर लोग न्यूज चैनल से दूर रहते हैं, लोग इस दिन इंटरटेनमेंट चैनल मसलन डांस इंडिया डांस, काँमेडी नाइट विद कपिल जैसे मनोरंजक प्रोग्राम ही देखना पसंद करते हैं, लेकिन इन दोनों चैनलों ने जिस तरह राहुल और नरेन्द्र मोदी की मार्केटिंग की, मैं भी मनोरंजक चैनलों के बजाए न्यूज चैनल पर ही बना रहा।

चलिए अब इनके इटरव्यू की बात कर ली जाए। जहां तक मुझे याद पिछले 10 सालों में आज तक चैनल पर इससे घटिया इंटरव्यू नहीं देखा होगा। आज तक में इंटरव्यू लेने के लिए इतने बड़े-बड़े चेहरे हैं, फिर उन्हें भोलू इंटर्न को भेजने की क्या जरूरत थी ? हो सकता है कि इंटर्न नाराज हो जाएं लिहाजा अब सिर्फ भोलू ही कहूंगा। देखिए बात शुरू हुई प्रधानमंत्री पद को लेकर। राहुल गांधी ने भोलू को समझाया कि हमारे यहां संविधान है, भोलू ने कहा, सही बात है.. संविधान तो है, राहुल ने पूछा.. संविधान में क्या लिखा है, जानते हैं..  आप लोग पढ़ते लिखते तो हैं नहीं, संविधान में लिखा है कि चुनाव के बाद सांसद प्रधानमंत्री का  चुनाव करेंगे । हम संविधान के हिसाब से चलते हैं.. बेचारा भोलू राहुल गांधी से डर गया और  ये भी नहीं पूछा कि 2004 में सांसदों ने तो सोनिया गांधी को चुनाव था, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बन गए। ऐसा तो संविधान में कहीं नहीं लिखा है। पूरे 24 मिनट तक राहुल गांधी सरकारी योजनाएं ही भोलू को समझाते रहे और बेचारा भोलू चुपचाप सरकारी योजनाएं समझता रहा।

अब अगर इंटरव्यू की शर्तों में ये बात शामिल थी कि बीच में कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा, जो राहुल बोलेंगे उसे पूरा दिखाया जाएगा, इंटरव्यू लेने पुण्य प्रसून वाजपेयी, राहुल कंवल जैसे नामचीन एंकर को नहीं भेजा जाएगा। तब तो मुझे कुछ नहीं कहना है, लेकिन मैं एक बात जरूर कहूंगा कि ऐसे  में आज तक चैनल को ये बिल्कुल नहीं कहना चाहिए था कि पिछले 10 साल का सबसे बड़ा इंटरव्यू है। इसे राहुल का राष्ट्र के नाम संदेश कहते तो भी चल जाता। बहरहाल मैं दावे के साथ कह सकता है कि पिछले 10 साल में मैने आज तक चैनल पर इससे घटिया कोई भी इंटरव्यू नहीं देखा।
दूसरा इंटरव्यू इंडिया टीवी पर नरेन्द्र मोदी का था। रात 10 बजे शुरू हुआ ये इंटरव्यू लगभग दो घंटे यानि 12 बजे तक चलता रहा, मैने भी इस इंटरव्यू को पूरा देखा। वैसे मोदी का इंटरव्यू शुरू होते हैं कि सोशल साइट पर मोदी विरोधियों ने रजत शर्मा पर हमला बोल दिया। किसी ने इसे पेड कहा तो किसी ने फिक्स बताया। ऐसी प्रतिक्रिया आई तो मैं सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या है जो इस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है। क्या जनता के मन  में कोई सवाल है जो रजत ने नहीं पूछा। मुझे लगता है कि जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल  गुजरात दंगा होगा, ये सवाल पूछा गया । अंबानी, अडानी, टाटा को दी गई जमीनों के बारे में भी सवाल पूछे गए। एक खास तपके की टोपी पहनने से इनकार कर दिया, ये सवाल भी पूछा गया, आडवाणी, जसवंत की नाराजगी पर भी सवाल पूछा गया, पिल्ला भी कार के नीचे आ जाए तो दुख होता है, ये सवाल भी पूछा गया, सुरक्षा, आर्थिक,  सामाजिक, विदेश नीतियों पर भी सवाल पूछे गए। हां हो सकता है कि कुछ लोग उनकी पत्नी के सवाल का इंतजार कर रहे हों कि आप अभी तक नामांकन पत्र में मैडम का नाम क्यों नहीं लिखते रहे ? इस बार क्यों शामिल किया ? रजत ने ये सवाल नहीं पूछा। लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं भी इस मत का हूं कि ये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए, राजनीति को निजी जिंदगी से दूर  रखना चाहिए।

रजत से अगर कोई शिकायत हो सकती है तो ये हो सकती है कि आम तौर पर उनका जो तेवर रहता है, वो कहीं ना कहीं मीशिंग था । अब ये विवाद का विषय है कि मोदी के सामने उनके तेवर खुद ढीले पड़ गए या फिर उन्होंने जान बूझ कर तेवर के साथ समझौता किया ? कुछ लोगों की शिकायत थी कि स्टूडियो में लगातार मोदी-मोदी के नारे क्यों लग रहे थे। ये एक जायज सवाल है, लेकिन चुनाव का माहौल है, ऐसे में उत्साही समर्थक अगर ऐसा कर रहे थे, फिर तो मुझे कोई शिकायत नहीं है, लेकिन इंटरव्यू का माहौल बनाए रखने के लिए अगर ये प्रायोजित किया गया था तो निश्चित ही एक गलत परंपरा है। बहरहाल चुनाव का माहौल है, आरोप प्रत्यारोप का सामना करना ही होगा, लेकिन मुझे इंडिया टीवी और आज तक के इंटरव्यू पर कमेंट करना हो तो मैं आजतक के इंटरव्यू को वाकई फिक्स इंटरव्यू ही कहूंगा।




    

Tuesday, 25 March 2014

आज तक साँरी आज की पत्रकारिता पर कचरा !


लोकसभा चुनाव कल खत्म हो जाएगा, लेकिन इस चुनाव में मीडिया का जो दागदार चेहरा सामने आ रहा है, उस दाग को साफ करना मीडिया के लिए आसान नहीं होगा। अच्छा छोटे मोटे अखबार या फिर चैनल ओछी हरकत करें तो एक बार उसकी अनदेखी की जा सकती है, लेकिन जब देश का नंबर एक चैनल होने का दावा करने वाला कोई हिंदी चैनल ऐसी घटिया हरकत करता है तो पूरी मीडिया कटघरे में खड़ी हो जाती है। पिछले दिनों एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी और अरविंद केजरीवाल के बीच हुई बात चीत का एक टुकड़ा सामने आया था, इससे मीडिया पर तरह तरह के आरोप लगे,  हालाकि इंटरव्यू के बाद हर नेता ऐसी बातें करता है, ये सामान्य बात है, लेकिन पत्रकार का जो रियेक्शन है वो ऐसा नहीं होता जैसा वाजपेयी का रहा। पूरा इंटरव्यू देखा है, लगा नहीं कि ये इंटरव्यू वाजपेयी कर रहे हैं, इसे अगर पेड इंटरव्यू कहा जाए तो गलत नहीं होगा ! वाजपेयी ने चैनल की जो किरकिरी कराई अभी उसकी चर्चा बंद भी नहीं हुई थी कि इसी ग्रुप की अंजना ओम कश्यप ने एक बार फिर चैनल की विश्वसनीयता पर कालिख पोत दी। ऐसा लगा कि चैनल का रिपोर्टर नहीं आप का कार्यकर्ता सवाल पूछ रहा है, लिहाजा छात्रों ने कश्यप पर कचरा फैंक कर अपना गुस्सा उतारा।  

वैसे जिस समय ये हादसा बीएचयू में हुआ, मैं तो वहां मौजूद नहीं था, लेकिन जो तस्वीरें और सवाल सोशल साइट पर देख  रहा हूं, उससे इतना तो साफ है कि अंजना ने पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा का पालन नहीं किया। आइये अब हम आप को विस्तार से बताते हैं की  बीएचयू कैंपस में आखिर हुआ क्या था। बताया गया कि अंजना बीएचयू कैंपस गई हुई थी, यहां उन्होंने पत्रकारिता की आड़ में अप्रत्यक्ष रूप से " आप " का प्रचार शुरू कर दिया। अपने सवालों के माध्यम से छात्रों को मोदी के ख़िलाफ़ भड़काने का प्रयास कर रही थी। छात्रों से उलटे सीधे सवाल पूछ रही थी, चलिए उनके सवाल भी सुन लीजिए।
१. अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में इतने भरी मतों से विजयी हुए थे, आप को क्यों लगता है की वो वाराणसी से नहीं जीत पाएंगे....?
२. जिस पार्टी में सीनियर नेताओं की इज्ज़त नहीं है ऐसी पार्टी को क्यों वोट देना चाहिए ?
३ नरेंद्र मोदी डर गए हैं क्या, इसलिए दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं?
४. अगर आप नरेंद्र मोदी को वोट देंगे तो क्यों देंगे ?
५. मोदी दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं अगर जीतने के बाद बनारस को छोड़ दिया तब क्या आप लोग ठगे महसूस नहीं करोगे ?
६. मोदी को क्यों वोट देंगे ? मोदी का मतलब क्या है ?
७. क्या हिंदुस्तान का मतलब हिंदुत्वा है ?
८. छात्रों को हड़का कर कह रही थी क्या आप लोग जानते हैं लोकतंत्र का मतलब क्या होता है ? लोकतंत्र का मतलब होता है चुनौती देना ।

इस सवाल और उनके तेवर से आप आसानी से समझ सकते हैं कि ये किसी जर्नलिस्ट का ना सवाल हो सकता है और ना ही तेवर। इस तरह के सवाल से ये संदेश जाना स्वाभाविक है कि आप पत्रकारिता नहीं कर रही हैं,  बल्कि एक खास पार्टी के लिए माहौल बना रहे हैं। वैसे बनारस को कोई राजनीति नहीं सिखा सकता। यही वजह है कि यहां लोगों ने ईंट का जवाब पत्थर से देकर उन्हें निरुत्तर कर दिया। आप भी सुनिए छात्रों के जवाब ..
१. हम किसी ऐसे आदमी को वोट नहीं देंगे जो अपनी बातों से पलट जाता है ।
२. हम भगोड़े को वोट नहीं देंगे, दिल्ली में काम करने का मौका मिला तो भागे क्यों ?
३. मोदी विकास पुरुष हैं, वो अगर जीते तो बनारस का ही नहीं पूरे देश का विकास होगा ।
४. केजरीवाल को एक बार मौका मिला था दिल्ली में जहां वो पूरी तरह फेलियर रहे ।
५. लड़कियों ने कहा की हमें सुरक्षा सिर्फ मोदी दे सकते हैं...
६. केजरीवाल चुनाव में सिर्फ हारेंगे ही नहीं बल्कि चुनाव बाद उनकी पार्टी खत्म हो जाएगी ।
७. मोदी धर्म निरपेक्ष हैं
८. एक छात्र ने अंजना ओम कश्यप को यहाँ तक कह दिया की आप अपने पथ से भटक गयी हो

वैसे यहां पूरे कार्यक्रम के दौरान छात्र "हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा लगा रहे थे। उनके नारा लगाने से शायद अंजना और खफा हो गईं और वो और आक्रामक होकर सवाल करने लगी, शायद ये बात छात्रों को ठीक नहीं लगी और वो अंजना को सबक  सिखाने की सोचने लग गए। ये सिलसिला अभी चल ही रहा था तभी पास की बिल्डिंग के ऊपर से छात्रों ने अंजना की हूटिंग शुरू कर दी, इतना ही नहीं बाद में अंजना के ऊपर कचरा भी फ़ेंकने लगे । हालत ये हुई कि अंजना को अपना कार्यक्रम बीच मेंए ही बंद करना करना पड़ा। हालाकि मैं अंजना पर फैंके गए कचरे का सख्त विरोधी हूं, बीएचयू के छात्रों को संयम बरतना चाहिए था । मेरा मानना है कि अंजना सवाल चाहे जैसे भी पूछती जवाब तो छात्रों को देना था, वो अपना जवाब देते। दरअसल  अंजना को लोग टीवी पर सुनते रहे हैं और सोशल मीडिया में तो उन पर पहले से ही पक्षपात का आरोप लगता रहा है। उनकी छवि एक  निष्पक्ष एंकर की न होकर आप समर्थक की है। शायद छात्रों का गुस्सा पत्रकार पर नहीं पीत पत्रकारिता पर था।

बहरहाल जो हुआ, ये नहीं होना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये  है कि मीडिया अगर बेईमान हो जाए तो आम जनता करे क्या ? मुझे तो लगता है कि अब मीडिया पर लगाम लगाने की वाली कोई संस्था जरूर होनी चाहिए। आत्मनियंत्रण का मौका सरकार ने दिया, लेकिन मीडिया ने वो मौका गवां दिया। अब नकेल कसे जाने की जरूरत है, जिससे कोई भी मीडिया हाउस गंदगी ना मचा सके।



Sunday, 22 December 2013

मीडिया है खुर्शीद की मौत का जिम्मेदार !

सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर की आत्महत्या के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया के काम काज के तौर तरीकों पर एक बार फिर उंगली उठने लगी है। एक टीवी न्यूज चैनल पर कुछ दिन पहले मणिपुर की एक लड़की ने खुर्शीद अनवर का नाम लिया और कहा कि अनवर ने उसके साथ बलात्कार किया। लड़की का आरोप है कि वो एक दिन रात में अनवर के घर पहुंची , यहां खुर्शीद ने कोल्ड ड्रिंक में नशीली दवा मिलाकर उसे पिला दिया। दवा की असर की वजह से वो वहीं सो गई। सुबह नींद खुलने पर उसे पता चला कि रात में उसके साथ बलात्कार किया गया है। कुछ दिन से इस मामले में सोशल मीडिया में भी काफी बहस चल रही थी। हालाकि पहले इस बहस में खुद खुर्शीद ने भी हिस्सा लिया और खुली चुनौती दी कि इस मामले की जांच हो ताकि सच सामने आए। आत्महत्या के बाद उनके यहां से मिले पत्र में उन्होंने कहा है कि लड़की के साथ सेक्स सहमति से हुआ था, ये रेप नहीं था। बहरहाल ये खबर जब मीडिया में चली तो शायद वो बर्दाश्त नहीं कर पाए और ऐसा रास्ता चुना जिसे हम तो सही नहीं मानते।

बहरहाल आत्महत्या की कहानी अब कई दिशा में बदल गई है। आत्महत्या की खबर मिलने के बाद कुछ लोगों ने एक न्यूज चैनल को गरियाना शुरू कर दिया और कहाकि उनकी वजह से एक सामाजिक कार्यकर्ता आत्महत्या करने को मजबूर हो गया। वजह बताई गई कि चैनल पर एक तरफा स्टोरी चल रही थी, जिस अंदाज में स्टोरी चल रही थी, उसे देखकर कोई भी व्यक्ति खुद को अपमानित महसूस करता और कोई भी कदम उठा सकता था। बहस शुरू  हुई तो कहा गया कि सिर्फ टीआरपी के लिए चैनल ने इतना गंदा खेल खेला। इतना ही नहीं ये मसला काफी पुराना था लेकिन इसे एक साजिश के तहत कहानी को जानबूझ कर 16 दिसंबर को चलाया गया, क्योंकि 16 दिसंबर निर्भया की पहली बरसी थी, लिहाजा पूरे देश में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। खुद खुर्शीद भी इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा रहे। लेकिन रात में जब चैनल ने उन्हें ही कटघरे में खड़ा किया और रेपिस्ट बता दिया, तो खुर्शीद बुरी तरह हिल गए। मैं भी इसी मत का हूं कि टीआरपीबाज मीडिया ट्रायल खुर्शीद अनवर को इतना गहरा सदमा दे गया कि उन्होंने मौत को गले लगाना ही बेहतर समझा।

खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या के पहले जो पत्र लिखा, उससे तो मेरी आंखे खुल गईं। एक तरफ उन पर गंभीर आरोप थे, जिसकी वजह से वो आत्महत्या करने जा रहे थे। दूसरी ओर उन्होंने इस पत्र में सामाजिक बुराइयों का विरोध करते हुए अपनी इच्छा जताई कि मरने के बाद उन्हें दफनाया ना जाए, बल्कि उनका अंतिम संस्कार विद्युत शवदाह गृह मे किया जाए। ये अलग बात है कि उन्होंने इस पत्र में स्पष्ट कर दिया कि लड़की के साथ जो कुछ हुआ वो दोनों की सहमति से किया गया सेक्स था, उसे बलात्कार की श्रेणी में रखना गलत होगा। खुर्शीद ने ये भी खुलासा किया है कि उस दिन लड़की ने जरूरत से ज्यादा शराब पी ली थी। वो इतने नशे में थी कि कहीं जा नहीं सकती थी। इसलिए उसे अपने घर में रुकने को कहा। फिलहाल पुलिस ये तय नहीं कर पा रही है कि घर से बरामद तीन पन्नों की चिट्ठी सुसाइड नोट है या डायरी। यही वजह है कि पुलिस सीएफएसएल से चिट्ठी की जांच करा रही है।

महिलाओं का पूरा सम्मान करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि जो कुछ दिखाई दे रहा है उससे कहीं हम महिलाओं और पुरुषों के बीच बड़ी खाई तो पैदा नहीं कर रहे हैं। लड़के लड़कियां पहले तो एक साथ घूमें फिरें, मौज मस्ती करें। फिर महीने दो महीने बाद आरोप लगा दें कि लड़के ने यौनशोषण किया ! मुझे तो ये बहुत ही खतरनाक ट्रेंड नजर आ रहा है। क्योंकि इस्लाम, हिंदू से लेकर हर तरह के धर्मों के कट्टरपंथियों से मोर्चा लेने वाला ये जांबाज,  कवि, शायर, चिंतक और समाजसेवी खुर्शीद बस मीडिया ट्रायल से इतना सहम गया कि उसने दुनिया ही छोड़ जाने का फैसला कर लिया। सच कहूं तो ये बड़ा खतरनाक वक्त है। माफ कीजिएगा, पर मुझे कहना है कि जो लड़की पिछले कई महीनों से जाने कहां-कहां रहती रही, जाने क्या-क्या कहती-करती रही, अचानक एक दिन आकर कहती है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है, और मीडिया बिना कुछ जाने समझे उसके पीछे खड़ा हो गया। मेरा सवाल है कि यह लड़की तो निर्भया आंदोलन की अगुवा रही है, ऐसे में तो उसमें इतना साहस होना ही चाहिए था कि जिस दिन उसके साथ रेप हुआ, उसी दिन पुलिस के पास जाती और रिपोर्ट दर्ज कराती। पर क्या कहा जाए, आजकल का जो दौर है, जो कानून हैं, जो माहौल है, उसमें तो सिर्फ लड़की के कह भर देने से पुलिस आपको पकड़कर अंदर कर देगी और मीडिया आपको बलात्कारी घोषित कर देगा।

सोशल मीडिया को लेकर पहले भी देश में चर्चा होती रही है। कहा गया कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग हो रहा है। अभी हम इतने परिपक्व नहीं हुए हैं, इसलिए इतनी आजादी भी खतरनाक है। अब सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर की मौत के बाद सोशल मीडिया और इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगा है। वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि मीडिया और सोशल मीडिया ट्रायल की जो प्रवृत्ति बनी है, वह गंभीर चिंता का मामला है। इस मामले में तो खुर्शीद के मित्रों और परिचितों का निष्कर्ष पर पहुंच जाना ज्यादा दुखद है। ये सिर्फ खुर्शीद का मामला नहीं है। मुझे लगता है कि समाज में फैसलों पर पहुंचने की हड़बड़ी है। लोगों में धैर्य नहीं है और भारी गुस्सा है। यहां कोई भी मामला आता है उसके बाद जिस तरह सोशल मीडिया एक राय बनाकर खड़ा हो जाता है, ये सिर्फ  गलत  ही नहीं बल्कि गंभीर भी है। इस पर सोशल मीडिया को न सिर्फ सोचने की जरूरत है, बल्कि देखना होगा कि कैसे इस पर रोक लगाई जा सकती है।
 
मैं खुर्शीद  साहब से कभी नहीं मिला, लेकिन उनके बारे ज्यादातर लोगों की राय पढ़ता  रहा हूं जो उन्हें नेक इंसान बताते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार मनीषा पांडेय अपने फेसबुक वाल पर उनके बारे में लिखा है :

लड़कियों के सिर के पीछे एक आंख होती है और कोई उनकी पीठ भी देख रहा हो तो वो जान जाती हैं कि देखने वाले की नजर कैसी है। मर्द कितने भी शातिर क्‍यों न हों, औरत की नजर से नहीं बच सकते। हम भांप ही लेते हैं। और तिस पर अकेले रहने-जीने वाली लड़कियां तो और भी हजार गुना ज्‍यादा सावधान होती हैं। हमारे कान हमेशा चौकन्‍ने होते हैं। और अपनी उन तमाम चौकन्‍नी निगाहों और कानों से देखकर, भांपकर मैं कह रही हूं कि खुर्शीद संसार के उन कुछ बेहद चुनिंदा पुरुषों में से एक थे, जिनकी मौजूदगी में मैं खुद को बहुत सुरक्षित और निश्चिंत महसूस किया करती थी। और मैं ही नहीं, मुझे और उन्‍हें जानने वाली दर्जनों लड़कियां। मैं कई बार उनके घर में बिलकुल अकेले रुकी हूं। खाया-पिया, गप्‍पें मारी और भीतर वाले कमरे में जाकर सो गई। उनके घर में मेरा बिस्‍तर, सबसे अच्‍छी वाली तकिया, चादर सब फिक्‍स था। वो पिंक कलर की वादर कहीं भीतर आलमारी में रखी हो तो ढूंढकर लाते और कहते, ये रही तुम्‍हारी फेवरेट चादर।

मुझे कभी ये ख्‍याल भी नहीं आया कि मुझे कमरे का दरवाजा भी बंद करना चाहिए। इतनी निश्चिंत तो मैं किसी रिश्‍तेदार के घर भी नहीं हो सकती, जैसे उनके घर पर होती थी। जैसे पापा के साथ होती हूं। कमरा खुला है, लेकिन फिर भी सुबह दरवाजे पर नॉक करते। कहते, उठ जा बेटा, चाय बन गई। और मैं पांच मिनट और, दो मिनट और करती आधे घंटे तो और नींद मार ही लेती थी। जब भी मिलते तो सिर पर हाथ फेरते थे। बिटिया बुलाते थे। कभी नहीं लगा कि वो पुरुष हैं और मैं उनके लिए एक स्‍त्री हो सकती हूं। एक क्षण को भी नहीं। मेरे लिए वो दोस्‍त थे। पिता की तरह थे। मैं उनसे अपने पापा की तरह ही जिद कर सकती थी। मुझे अब भी यकीन नहीं और कभी नहीं होगा कि उन पर लगे आरोपों में कोई दम है। सब झूठ की फसीलें लगती हैं।

बहरहाल अब जो नुकसान होना था वो हो चुका है, पूरे मामले की जांच पुलिस कर रही है, सच्चाई भी सामने आ ही जाएगी। निर्भया बेटी के साथ जो कुछ हुआ उसकी तो जितनी भी निंदा हो वो कम है। लेकिन मेरा सवाल है कि इस घटना के बाद जिस तरह देश में महिलाँओं और पुरुषों ने एक साथ मिलकर एक सख्त कानून की वकालत की और संसद से कानून पास भी करा लिया, क्या खुर्शीद अनवर के मामले में भी  उसी तरह महिलाएं और पुरुष एक साथ एक  मंच पर आकर ये मांग करेंगे कि महज आरोप लगाने भर से आदमी पर इस तरह शिकंजा नहीं कसा जाना चाहिए ?

Thursday, 28 November 2013

खुलासा : सोशल मीडिया का असली चेहरा !

कोबरापोस्ट का खुलासा सोशल मीडिया का सच्च : आई.टी. कंपनियां किस तरह से पैसे के लिए इसे इस्तेमाल करके लोगों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रही है।लंबे समय तक चले अंडर कवर ऑपरेशन में कोबरापोस्ट ने खुलासा किया है कि किस तरह से आई.टी. कंपनियां देश भर में सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब की सहायता से नेताओं की लोकप्रियता को फर्जी तरीके से बढ़ाने के साथ साथ उनके विरोधी खेमे को बदनाम करने का काम धड्ड़ले से कर रही हैं।

कोबरापोस्ट के एक लंबे अंडर कवर ऑपरेशन ‘ब्लू वायरस’ में यह बात सामने आई है कि लगभग दो दर्जन आई.टी. कंपनियां देश भर में सोशल मीडिया पर ऑनलाइन रेपोटेशन मैंनेजमेंट का गोरख धंधा चला रही है। ये पैसे लेकर अपने ग्राहकों के लिए फेसबुक और ट्विटर पर फर्जी तरीके से फैन फॉलोविंग बढ़ाने और विरोधियों को बदनाम करने का काम करती है इनके लिए किसी शख्सियत की ऑनलाइन प्रतिष्ठता बढ़ाना या उनकी इज्जत उतारना बस एक क्लिक करने भर का काम है इनके ग्राहकों में नेता, राजनितिक पार्टियां, व्यापारिक घराने, एन.जी.ओ.  और घोटालों में फंसे नौकरशाह शामिल हैं। कोबरापोस्ट के एसोसिएट एडिटर  सैयद मसरूर हसन ने विरोधी पार्टी के एक कल्पित नेता के कारिंदा बनकर इन आई.टी कंपनियों से कहा कि नेताजी विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर अपनी छवि बनाना चाहते हैं। इसके साथ साथ अपने विरोधी नेता की इज्जत उतारना चाहते हैं। उनका उद्देश्य आने वाले विधानसभा चुनाव अच्छे फासले से जीतना है ताकि वे पार्टी अध्यक्ष का विश्वास भी हासिल कर सके और लोकसभा टिकट उनकी झोली में आ जाए। इससे उनका केबिनेट मंत्री बनने का रास्ता भी साफ हो जाएगा। आपको मुंहमांगा पैसा मिलेगा।

 इन सभी कंपनियों ने नेताजी को चुनाव जिताने के लिए कई तरह के कामों को अंजाम देने की पेशकश की। इन सभी सेवाओं का सार इस प्रकार है:- 
Ø वे नेता जी के फेसबुक पेज, वेबसाइट पर फर्जी प्रोफाइल बना कर या खरीद कर लाखों की संख्या में लाइक्स बनाने और इस तरह फर्जी फॉलोवर बनाने का काम करेगें।
Ø अगर नेताजी के खिलाफ कोई गलत टिप्पणी करता है तो उस टिप्पणी को हटा देगें।
Ø वे नेताजी के विरोधी खेमे की इज्जत उतारेगें।
Ø इस तरह की गलत टिप्पणियों को दूसरे देशों जैसे अमेरिका, कोरिया इत्यादि से पोस्ट करेगें ताकि इसका पता ना चल सके कि यह काम कहां से किया जा रहा है।
Ø इस तरह के प्रचार के लिए ऐसे कंप्यूटरों का इस्तेमाल किया जाएगा जिन्हें जोड़कर बनाया गया हो और काम खत्म होने के बाद उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा।
Ø इस तरह के काम के लिए वे प्रॉक्सी कोड का इस्तेमाल करेगें ताकि उनकी लोकेशन बदलती रहे और पता ना चल सके की यह काम कहां से हो रहा है।
Ø नेताजी और उनकी पार्टी के बारे में मुसलमानों के विचारों को बदलने के लिए वे मुसलमानों की फर्जी प्रोफाइल बनाएगें।
Ø वे नेता जी के प्रचार के लिए विडियो बनाएगें और उसे यूट्यूब पर अपलोड कर वाइरल करेगें।
Ø मतदान केंद्र पर पकड़ बनाने के लिए वे नेताजी को मतदाताओं के व्यवसाय, रिहाइश, उम्र, आमदनी, जाति और धर्म के हिसाब से आंकड़े देगें।
Ø वे बाहरी देशों के आई.पी एड्रेस का इस्तेमाल करेंगे ताकि वो नेताजी के ऑनलाइन प्रचार के लिए या उनके विरोधी खेमे के खिलाफ उल्टा प्रचार करने के लिए जो भी सामग्री सोशल मीडिया पर प्रकाशित करेगें उसके स्त्रोत का पता ना लग पाए।
Ø दूसरे लोगों के कंप्यूटर को हैक कर उसके आई.पी का इस्तेमाल इस तरह के गलत प्रचार के लिए करेगें।
Ø ट्राय के नियमों से बचने के लिए वे इंटरनेट पर एकमुश्त सैकड़ो हजारों की संख्या में एस.एम.एस भेजेगें। इसके लिए शॉर्ट कोड का इस्तेमाल करेगें ताकि भेजने वाले की पहचान पता न लग पाए।
Ø अपने काम का भुगतान वो सिर्फ कैश में लेंगे ताकि यह पता लगाना मुश्किल हो जाए कि उन्होंने नेताजी के कहने पर यह सब काला कारनामा किया था।

इन सब आई.टी से जुड़े प्रोफेशनल लोगों ने ऊपर जो जो कारनामे करने का वादा कोबरापोस्ट के खोजी पत्रकार सैयद मसरूर हसन से किया था वह सब उन कारनामों के सामने फीका पड़ जाता है जो उन्हीं जैसे पेशेवर लोगों ने करने को कहा। लगता है मानो हम किसी अपराधी से बात कर रहे हैं।

एक ऐसे ही प्रोफेशनल बिपिन पठारे है जो कोबरापोस्ट की छानबीन में सबसे धूर्त और निर्मम व्यक्ति के रूप में उभरा है। पठारे पैसे के लिए किसी भी हद तक नेताजी की मदद करने के लिए तैयार है, मसलन वह हमें मतदान केंद्रों के अनुसार मतदाताओं की जानकारी देने को तैयार है। यानि किस भाषा का, किस जाति का, किस धर्म का मतदाता किस गली में रहता है। उदाहरण के लिए इस तरह की जानकारी से वह हमें मुस्लिम मतदाताओं को मतदान से रोकने में मदद कर सकता है। इसके लिए वह दंगे की अफवाह फैलाने और आतंक फैलाने के लिए हैंड ग्रेनेड भी फोड़ सकता है। इसका सीधा सा मतलब है कि मुसलमान मतदाताओं के बदले फर्जी वोट डाले जा सकते हैं। उसका दावा है कि उसने प्रवीन ज़ारा नाम के एक नेता को चुनाव जिताया है। 

चलिए यह कैसे होता है हम उसी की जुबानी सुन लें:  “इधर प्रवीन ज़ारा जीत गया ना…  उधर हमलोगों ने क्या किया था मालूम है... एक एक जगह पे मुस्लिम वोट थे मुस्लिम तो नहीं डालेगें हमें मालूम  था पक्का … उधर 60% जो मुस्लिम वोट थे …  हमलोग ने कैसा किया उन्हें उधर दंगा किया …  एक थोड़ा सा हैंड बम होता है … बम वगैरह वो सब फोड़ा उधर उनके ही लोगों ने …  वहां कोई बाहर नहीं आया …  उनका 60% वोट आ गया … ये सब strategy  है ना ”. 

 आशा है निष्पक्ष चुनाव के बड़े-बड़े दावे करने वाला चुनाव आयोग यह सब सुन रहा होगा कि बिपिन पठारे   जैसे लोग किस प्रकार से अल्पसंख्यकों के मताधिकार का हनन कर रहे हैं।
 इसी तरह अभिषेक कुमार राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव से पहले एक बहुत ही अवमाननाजनक दुष्प्रचार करने की बात कर रहा है। वह दावा कर रहा है कि वह सोशल मीडिया पर मोदी के प्रचार का काम कर रहा है। और उसने हसन को यह सब अपने कंप्यूटर पर भी दिखाया।कोबरापोस्ट ने जिन कंपनियों के काले कारनामे को उजागर किया है उनमें से कई कंपनियां नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए काम कर रही हैं।

ये कंपनियां जैसा दावा कर रही थी उसे परखने के लिए हमने प्रियदर्शन पाठक से मरक्यूरी एविएशन के फर्जी नाम से एक कंपनी के खिलाफ दुष्प्रचार करने का सौदा तय किया। यह सौदा 92,000 रूपए में तय हुआ। पाठक ने वाकई यह काम कर दिखाया। उसने मरक्यूरी एविएशन की वेबसाइट और तमाम अन्य वेबसाइटों पर हर तरह का दुष्प्रचार किया। जैसे कंपनी अपने यात्री को ठगती है, वह मनी लॉड्रिंग के काम में लगी हुई है, वह अपने संसाधनों को आतंकवाद के कामों में लगा रही है। कंपनी की वेबसाइट पर धमकी भरे मेल भी डाली गई। इस प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए मजेदार कार्टूनों का जमकर इस्तेमाल किया गया है। पाठक को हमने 42,000 रूपए दो किस्तों में दिए जो उसने खुफिया कैमरे के सामने गिने। पाठक ने हमें सोशल मीडिया पर इस दुष्प्रचार के प्रिंटआउट भी दिए हैं।

इनमें से ज्यादातर कारनामे भारतीय दंड संहिता, आई.टी.एक्ट 2000, इनकम टैक्स एक्ट 1951 का उल्लंघन है। इन कानूनों के अनुसार आपत्तिजनक सामग्री या कार्टूनों का प्रकाशन मानहानि है, यह आई.पी.सी के तहत दंडनीय अपराध है। इंटरनेट कनेक्शन या डोमेन नेम के लिए फर्जी पहचानपत्र का उपयोग करना धोखाधड़ी है और आई.पी.सी की विभिन्न धाराओं के तहत दंडनीय भी है। इसी तरह से हैकिंग भी आई.टी एक्ट की धारा 66 के तहत दंडनीय है। अल्पसंख्यकबहुल क्षेत्र में बम विस्फोट करना या दंगों की अफवाह फैलाकर लोगों को मताधिकार से वंचित करना, मतदान केंद्रों पर कब्जा करना, आर.पी.ए. एक्ट 1951 की धारा 125 और 135A के तहत दंडनीय है। मतदान केंद्रों को लूटने की चर्चा करना या वोटों को खरीदना आई.पी.सी की धारा 120B के तहत दंडनीय है।

ये सब कानूनी बातें हैं लेकिन सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल घृणा फैलाने और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने के लिए किया जा रहा है। सोशल मीडिया का यह डरावना चेहरा बार बार नजर आ रहा है। भले वह मुजफ्फरनगर के दंगे हों या पूर्वोत्तर के प्रवासियों का भारत के कई शहरों से पलायन हो, समाज के ताने बाने को तार तार करने वाली इन घटनाओं में सोशल मीडिया की भूमिका अब पूरे देश के लिए चिंता का सबब बनते जा रही है। इसकी चर्चा न केवल सरकारी महकमों बल्कि समाचार माध्यमों में भी खूब होने लगी है।

ऑपरेशन ब्लू वायरस में जिन आई.टी कंपनियों के काले कारनामों को उजागर किया गया है उनके खिलाफ गहरी छानबीन होना जरूरी है। उनके खिलाफ उचित कानूनी कारवाई की जानी चाहिए। समय आ गया है कि सरकार इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो और एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में काम करे जो पूरी तरीके से सोशल मीडिया के दुरूपयोग को रोकने में कामयाब हो लेकिन इसके साथ ही विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बचाए रखा जाए।  इस बात को बीते अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है जब सोशल मीडिया पर नेताओं पर टिप्पणी के आरोप में महाराष्ट्र की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह से आंध्र प्रदेश में एक नेता के चित्र फेसबुक पर डालने के जुर्म में एक PUCL  कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार ने रामपुर के एक दलित लेखक को आई.एस अधिकारी दुर्गा नागपाल के निलंबन पर सवाल उठाने पर गिरफ्तार कर लिया था।

 कोबरापोस्ट के इस ऑपरेशन ‘ ब्लू वायरस’ में एक बात और उभर कर आई है। सोशल मीडिया में प्रचार के मामले में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा सबसे आगे है और साथ में उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी भी। जिनके लिए दर्जनों कंपनियां दिन रात काम कर रही है। सोशल मीडिया पर जुटाई गई यह लोकप्रियता कितनी विश्वसनीय है यह ऑपरेशन ब्लू वायरस से साफ हो जाता है बल्कि ऐसा झूठा प्रचार करने में लगे TRIAMS  के त्रिकम पटेल ने यह बात स्वीकार की है कि यदि यह बात जनता को पता लग जाए तो उसका भरोसा सोशल मीडिया पर परवान चढ़ी लोकप्रियता से हमेशा के लिए उठ जाएगा। त्रिकम पटेल की जुबानी सुनिए “ कहीं न्यूज चैनल को पता चल गया... कि भई ये लोग मंत्री लोग ऐसे मार्केटिंग कर रहे हैं.... जबरदस्ती मार्केटिंग कर रहा है.... जबरदस्ती ऐसे मार्केटिंग करता है… तो लोगों को दिल उतर जाता है.. ” त्रिकम पटेल की मानें तो बैंगलौर की आई.टी कंपनियों को 3% की आमदानी राजनीतिक पार्टियों के प्रचार कार्यों से हो रही है जिसमें भाजपा  का बहुत बड़ा योगदान है।

ऑपरेशन ब्लू वायरस के खुलासे से एक निर्विवाद निष्कर्ष निकलता है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल सामाजिक हितों के बजाय समाज को गुमराह करने में अधिक हो रहा है।

कोबरापोस्ट से साभार 

Tuesday, 19 November 2013

बिहार : पत्रकारों को चोर बना रहे हैं नीतीश !

बिहार के पत्रकार मित्र से बात हो रही थी, काफी दिन बाद उनसे मिलना हो रहा था, लिहाजा तय हुआ कि प्रेस क्लब में ही मिलते हैं। तय  समय पर प्रेस क्लब में पहुंच कर कुछ पीने-खाने का आर्डर दिया गया और बात घर परिवार से शुरू होकर बिहार की पत्रकारिता पर पहुंच गई। पत्रकारिता पर बात शुरू होते ही मित्र की आंखे डबडबा गईं, मैं फक्क पड़ गया। ऐसा क्या है कि मित्र की आँख में आंसू आ गया। मैने पूछा.. हुआ क्या ? इतना गंभीर क्यों हो गए ? भाई जब मित्र ने बोलना शुरू किया तो फिर एक सांस में बिहार की राजनीति को दो सौ गाली दी । कहने लगे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की पत्रकारिता को पूरी तरह दफन कर दिया है। अखबारों के मालिक विज्ञापन के लिए नीतीश के सामने घुटने टेक चुके हैं। अब नीतीश सरकार पत्रकारों को चोर बना रही है और उन्हें नगर पालिका के होर्डिंग्स आवंटित किए जा रहे हैं। ये सब सुनकर मैं तो हैरान रह गया, फिर मुझे भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू की वो टिप्पणी याद आई जो उन्होंने बिहार के लिए ही कही थी कि "बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना संभव ही नहीं है" ।

मुझे याद है कि पांच छह महीने पहले भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैन मारकंडेय काटजू ने कहा था कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता संभव ही नहीं है, तो इस बात पर मुझे हैरानी हुई, मैने पूर्व जस्टिस काटजू के इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की थी। मैने कई जगह इस विषय पर लेख भी लिखा और काटजू साहब को कटघरे में खड़ा किया। लेकिन आज बिहार की पत्रकारिता की जो तस्वरी सामने आ रही है, वो वाकई बहुत चिंताजनक है। वहां हालत ये है कि किसी संपादक की औकात नहीं है बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ अखबार में एक भी शब्द लिख सकें। वहां एक बड़े अखबार समूह के संपादक ने बस थोड़ी कोशिश भर की थी कि उनको पटना से अखबार ने बेदखल कर दिया। हालांकि वहां संपादक को जब पता चला था कि मुख्यमंत्री नाराज हैं तो बेचारे उनसे मिलकर सफाई दे आए थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने माफ नहीं किया। अब सभी अखबार के संपादकों को पता है कि अगर बिहार में संपादक बने रहना है तो मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से पंगा नहीं लेना है।

पत्रकार मित्र ने बताया कि बीजेपी नेता नरेन्द्र मोदी ने पटना के गांधी मैदान में सभा को सबोधित करते हुए नीतीश कुमार को अहंकारी बताया था। एक अखबार के पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में ये शब्द इस्तेमाल कर दिया। बता रहे हैं कि संपादक ने उसे उल्टा टांग दिया। कहने लगे तुम्हें तो नौकरी करनी नहीं है, हमारी नौकरी के दुश्मन क्यों बन रहे हो ? आप समझ सकते हैं कि अगर किसी अखबार का संपादक ही इस कदर मुख्यमंत्री का पालतू बन चुका हो तो बाकी स्टाफ के बारे में आसानी से समझा जा सकता है। इतनी बात करते-करते मित्र बिल्कुल उदास हो गए, कहने लगे बस ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि किसी तरह पटना से मुक्ति मिल जाए। बहरहाल मैने उन्हें मित्रवत सुझाव दिया कि भाई जब तक दूसरी जगह बात ना हो जाए, ऐसा वैसा कोई कदम मत उठाना।

संपादकों की बात करते-करते उन्होंने वहां के पत्रकारों के बारे में बताना शुरू किया। कहने लगे कि बिहार में जब पत्रकारों ने देखा कि उनके मालिक और संपादक ही सरकार के सामने दुम हिला रहे हैं, तो वो भला शेर क्यों बनें ? पत्रकारों ने भी शुकून से नौकरी का रास्ता अपना लिया। बता रहे हैं कि पटना में नगर पालिका ने सारे होर्डिंग्स का ठेका पत्रकारों को दे दिया है। पत्रकारों ने उनकी औकात के हिसाब से होर्डिंग्स दिए गए हैं। बड़े ग्रुप के अखबार या चैनल में हैं तो ऐसे पत्रकार को 20 से 25 होर्डिंग्स दिए गए हैं। उसके बाद 15, 10 और कुछ को पाच- सात से ही संतोष करना पड़ा है। पहले पत्रकारों को एक होर्डिंग्स के लिए सालाना 50 रुपये देने पड़ते थे। पत्रकार मित्र इस होर्डिंग्स को 15 से 25 हजार रुपये महीने में दूसरों को बेच दिया करते थे। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पिछले दिनों नगर पालिका ने होर्डिंग्स के किराए को रिवाइज किया और इसका किराया 50 रुपये सालाना से बढ़ाकर 200 रुपये सालाना कर दिया। पत्रकार लोगों ने इसे लोकतंत्र पर खतरा बताया और इस मामले को लड़ने के लिए "सुप्रीम कोर्ट" चले आए। ये अलग बात है कि कोर्ट को पता चल गया कि ये धंधेबाज पत्रकार हैं, लिहाजा कोर्ट ने राहत नहीं दी।

अच्छा पत्रकारों का ये गोरखधंधा जानकर आपको लग रहा है कि इसमें वही गली मोहल्ले छाप पत्रकार शामिल होंगे। माफ कीजिएगा ऐसा नहीं है। चलिए आप से ही एक सवाल पूछते हैं आप इलेक्ट्रानिक मीडिया में किस-किस चैनल का नाम जानते हैं ? मैं समझ गया कि आप किस - किस चैनल का नाम ले रहे हैं। राष्ट्रीय चैनल हो या फिर क्षेत्रीय,  हिंदी में हो या अंग्रेजी में, या फिर भोजपुरी में ही क्यों ना हो.. ज्यादातर चैनल के पत्रकार इस गोरखधंधे में बराबर के हिस्सेदार हैं। चैनल का नाम इसलिए पहले लिया कि आप सब जानते हैं कि टीवी चैनल के पत्रकारों का वेतन ठीक ठाक है, लेकिन बेईमानी के माल की बात ही कुछ और होती  है । चैनल का जब ये हाल है तो अखबारों के पत्रकार किस स्तर पर होर्डिंग्स के लिए मारा मारी कर रहे होंग, ये आसानी से समझा जा सकता है। वैसे वहां से छपने वाले अखबारों के पत्रकारों की ज्यादा मौज है, बाहर से आने वाले अखबार की कुछ कम है, लेकिन चोरी में वो भी शामिल हैं।

ऐसी ही शिकायत मिलने पर भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैने मारकंडेय काटजू ने बिहार की पत्रकारिता पर तीखा बयान देने के साथ ही तीन पत्रकारों की एक कमेटी बनाई और पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। बताते हैं कि पत्रकारों की ही कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि बिहार में निष्पक्ष पत्रकारिता करना असंभव है। इस टीम ने नीतीश सरकार की तुलना आपातकाल से की है। कहा जा रहा है कि इमरजेंसी के दौरान स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर जिस तरह सेंसरशिप लगी हुई थी, वही स्थिति इस समय नीतीश सरकार के कार्यकाल में भी है। आज बिहार में ज्यादातर पत्रकार घुटन महसूस कर रहे हैं। विज्ञापन के लालच में मीडिया संस्थानों को राज्य सरकार ने बुरी तरह अपने चंगुल में जकड़ रखा है। हालत ये है कि पत्रकार स्वतंत्र और निषपक्ष खबर लिख नहीं पा रहे हैं। बहरहाल प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने सुझाव दिया है कि विज्ञापन देने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए जो विज्ञापन जारी करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो, पर नीतीश इस सुझाव को भला क्यों मानेंगे ? अब समझ गए ना यही है नीतीश के सुशासन का असली और बदबूदार चेहरा !



Wednesday, 25 September 2013

न्यूज रूम का पारा पचास के पार !

आजकल न्यूज रूम में बहुत तनाव है, इस तनाव का असर न्यूज रूम के साथियों के चेहरे पर आसानी से पढ़ा जा सकता है। अच्छा ऐसा नहीं है कि ये तनाव किसी एक न्यूज चैनल के दफ्तर में है, सुन रहा हूं कि लगभग सभी चैनलों के हालात एक से हैं। मित्रों से बात होती है तो उनका दर्द सुनकर सच कहूं तो रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। आप सब को पता है कि आजकल मंदी की आड़ में न्यूज चैनलों में बड़े पैमाने पर छटनी हो रही है। जो छटनी के शिकार हुए वो तो सड़क पर आ जाने से दुखी हैं ही, लेकिन जो बच गए, वो उनसे भी ज्यादा परेशान हैं या यों कहिए कि परेशान किए जा रहे हैं। मेरा मानना है कि काम के दौरान गलती होना और संपादक की डांट सुनना दोनों ही काम का एक जरूरी हिस्सा है, लेकिन अब गलती होने पर सबसे बड़ा संपादक भरे न्यूज रूम में मां - बहन की गाली देने लग जाए तो उसके तनाव को भी आसानी से समझा जा सकता है।  

ज्यादातर न्यूज चैनलों में इन दिनों एक ऐसा माहौल बना हुआ है कि कब किसकी नौकरी चली जाएगी, कोई भरोसा नहीं है। किसी को ये लग रहा हो कि उसका ट्रैक रिकार्ड बहुत बढिया है, वो अच्छा काम करता आ रहा है, इसलिए उसका कुछ नहीं होगा तो बहुत बड़ी गलत फहमीं में है। हर न्यूजरूम से पत्रकारों की छुट्टी हो रही है। चलिए छुट्टी हो जाने के बाद सड़क पर आए पत्रकार अपने आगे की राह तलाशने में लगे हुए हैं। कुछ को मिल भी गई, कुछ की बात चीत पाइप लाइन में है, हां कुछ निराश भी हैं, पर अपनी क्षमता के मुताबिक लगे तो हुए हैं। लेकिन सबसे ज्यादा शर्मिंदगी उन्हें झेलनी पड़ रही है, जिनकी बच गई है। बात - बात में उन्हें बताया जा रहा है कि ऐसा नहीं है कि तुम बहुत काबिल हो, इसलिए रह गए। सुरेन्द्र और गजेन्द्र ( काल्पनिक नाम ) तुमसे बेहतर काम जानते भी हैं और करते भी रहे हैं, चाहता तो उन्हें रोककर तुम्हारी छुट्टी कर देता। लेकिन मैने तु्म्हे मौका दिया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि सुरेन्द्र और गजेंद्र बढिया काम कर रहे थे, ये बात संपादक जी लोग जब खुद मान रहे हैं, तो उनकी छुट्टी क्यों कर दी ?

खैर ये सामान्य बात है, ऐसा होता रहता है। कोई आदमी काम बहुत अच्छा जानता हो और लेकिन उसका चेहरा बाँस को पसंद ना हो तो इससे भी संस्थान के काम काज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। काम ना जानता हो, लेकिन चेहरे पर चमक हो, इससे उसे देखकर बाँस के चेहरे पर भी चमक रहती है और संस्थान का काम चलता रहता है, गुणवत्ता भले प्रभावित हो। वैसे भी आजकल कामयाबी का पैमाना गुणवत्ता रह भी नहीं गया है। बता रहे हैं कि अब न्यूज रूम में अलग तरह का संकट है। संस्थान को जिस काम के लिए आदमी चाहिए, वो काम जानने वाले की छुट्टी हो गई, जो लोग बचे हैं और वो जो काम जानते हैं, उस काम की अब जरूरत ही नहीं रह गई। एक जमाना था चाहे समाचार पत्र हों या फिर चैनल हर जगह एक बात होती थी, कि आप विशेषज्ञ बनें। किसी भी एक विषय की भरपूर जानकारी होनी चाहिए। लेकिन अब ऐसा नहीं है, कहा जा रहा है कि आप 36 नंबर के "पाना" बनें, मतलब जब जहां जरूरत हो, वहां आप फिट हो सकें। खैर पाना बन रहे हैं, थोड़ा समय लगेगा।

बात काफी पुरानी है, पर मुझे आज भी याद है। जर्नलिज्म की शुरुआत कर रहा था, बड़े-बड़े को अपनी लेखनी से ठिकाने लगाता रहता था, कई बार हमारे स्थानीय संपादक खबर छापने से मना कर देते तो उनसे सवाल जवाब कर लेता था। बात मालिकों तक पहुंचती थी, फैसला कभी उनके हक तो कभी मेरे हक में, ये सब चलता रहता था। एक दिन वो संपादक मुझे  डिनर पर ले गए और समझाने लगे। उम्र में छोटे हो,  इसलिए समझा रहा हूं, ये बात कोई संपादक तुम्हे डिनर कराते हुए नहीं समझाएगा। जो तेजी है, वो भूल जाओ, ज्यादा खतरा लेना सही नहीं है, समय खराब आया तो कोई अगल बगल खड़ा नहीं दिखाई देगा। इसी बात चीत में उन्होंने एक बात कही और ये भी समझाया कि इस मंत्र को गांठ बांध लो। कहा कि रिपोर्टर बनने की कोशिश मत करो, स्टाफर बनो ! मैं समझा नहीं, पूछ लिया कि क्या कहा आपने, रिपोर्टर नहीं स्टाफर बनो। बोले रिपोर्टर तो कोई भी बन सकता है, स्टाफर बनना मुश्किल है। बताने लगे कि स्टाफर वो होता है जो संस्थान की जरूरत के मुकाबले संस्थान के मालिक की इच्छा को प्रमुखता देता है। मालिक आपको कहेगा नहीं कि फलां काम ऐसे होना चाहिए, ये आपको खुद समझना होगा। अगर आप समझ गए तो कामयाब हैं, वरना खुद झेलोगे। आज लग तो रहा है कि उनकी बातों में दम था, लेकिन पछतावा नहीं है।  

अब देखिए, दो महीने पहले की बात है, एक बड़े चैनल में वहां के वरिष्ठ पत्रकार के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि उन्हें चैनल ही छोड़ना पड़ा। दरअसल किसी भी चैनल में हर वो  आदमी संपादक के निशाने पर रहेगा, जो संपादक से ज्यादा जानकार है या फिर उसका चेहरा संपादक के मुकाबले अधिक टीआरपी वाला है। अगर ऐसा है तो समझ लीजिए कि फिर  आपकी खैर नहीं, आप हमेशा संपादक के निशाने पर ही रहेंगे। हालात ऐसे बन जाएंगे कि एक ना एक दिन आपको जाना ही होगा। या तो फिर संपादक के सामने समर्पण करना होगा, उसे ये अहसास दिलाना होगा कि संपादक जी जो कह रहे हैं वो ही अंतिम सत्य है। उसके आगे पीछे सब गलत है। साफ साफ कहूं तो आपको ये साबित करना होगा कि आप पूरी तरह मूर्ख थे, वो तो संपादक के सानिध्य में आकर थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना सीख गए। अगर ये संपादक आपको ना मिले होते तो आज आप कहीं भठ्ठे पर मजदूरी करके किसी तरह पेट पाल रहे होते।  अगर ये क्वालिटी आप में है तो फिर घबराने की कोई जरूरत नहीं है। ऐड़ा बनकर पेडा़ खाते रहिए।

अखबारों का हाल और बुरा है। किसी भी अखबार के संपादक से बात कीजिए, वो स्वीकार करते हैं कि आदमी की कमी है, सीनियर और जानकार की तो बहुत ही ज्यादा जरूरत है। तो साहब रखिए ना, बहुत सारे लोग तो हैं, जो अच्छा काम जानते हैं, कर सकते हैं। लेकिन नहीं रख रहे हैं। वजह बताते हैं कि रुपया कमजोर होने से सबसे ज्यादा मुश्किल समाचार पत्रों को ही तो हो रही है। अखबारी कागज बाहर से मंगाने पड़ते हैं, कहा जा रहा है कीमत लगभग दोगुना हो गई है, रुपया यूं ही कमजोर होता रहा तो छोटे मोटे अखबार तो बंद ही हो जाएंगे। इस हालात में कहा जा सकता है कि अखबारों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। भाष्कर जैसे बड़े ग्रुप को अगर अपने एडिशन बंद करने पड़ रहे हैं तो दूसरे अखबारों की हालत को आसानी से समझा जा सकता है। इन हालातों में आप समझ सकते हैं कि अखबारों के दफ्तर में भी टीवी के मुकाबले तनाव कोई कम नहीं है। वैसे एक बात बताऊं, अखबारों  में गाली - गलौज तो कामकाज ही एक हिस्सा है। यहां ये सामान्य बात है।