Friday, 19 July 2013

MEDIA : अब तो हद हो गई !



सच कह रहा हूं, आने वाले समय की आहट हम सब सुन नहीं पा रहे हैं। इसका नतीजा किसी एक को नहीं, बल्कि हम सबको भुगतना पड़ सकता है। जरूरी है कि मीडिया एक बार फिर प्रोफेशन से हटकर मिशन बनकर उभरे। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है, वो ये कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करने पर राजनीतिक दल के साथ अचानक मीडिया उन्हें लेकर क्यों आक्रामक हो गई है ? मोदी कुछ भी बोलते हैं तो उनके एक शब्द को लेकर बुद्धू बक्से (टीवी) पर बहस शुरू हो जाती है। अब कांग्रेस के नेता... सॉरी,  उनके हास्य कलाकर कैमरे के सामने आते हैं और कुतर्क करने में जुट जाते हैं। अच्छा मोदी का विरोध नेता करें तो बात समझ में आती है, लेकिन मोदी के किसी बात को लेकर अगर मीडिया उसे मुद्दा बनाकर बहस करने लग जाए तो जाहिर है मीडिया पर सवाल खड़े होंगे ही। अब देखिए उत्तराखंड की तबाही को लेकर महीने भर से मीडिया घड़ियाली आंसू बहाती रही, लेकिन उत्तराखंड के पीडि़तों की मदद के लिए हैदराबाद में मोदी की रैली में आने वालों से पांच रूपये सहायता मांग लिया गया गया तो केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने सबसे पहले जहर उगला, और कहा कि मोदी की हैसियत के हिसाब से उनके भाषण की फीस वसूली जा रही है। मुझे लगता है कि तिवारी अच्छी तरह जानते हैं कि अगर मोदी की हैसियत पांच रूपये टिकट की है तो राहुल को तो 50 रुपये देकर जनता को बुलाना होगा। बहरहाल मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता, लेकिन ये जरूर कहूंगा कि सिर्फ राजनेताओं को नहीं मीडिया को भी ये स्वीकार करना होगा कि आज मोदी देश में सबसे लोकप्रिय नेता हैं, जिन्हें लोग पूरे मन से सुनते तो हैं।


हफ्ते भर से इलेक्ट्रानिक मीडिया में “पिल्ला”  यानि कुत्ते के बच्चे को लेकर बहस छिड़ी हुई है। अच्छा ऐसा नहीं है कि ये बहस सिर्फ बुद्दू बक्से पर हो रही है। बल्कि अखबारों में भी संपादकीय पेज पर तमाम बड़े-बड़े पत्रकार पन्ना काला किए पड़े हैं। दरअसल हुआ ये कि एक पत्रकार ने गुजरात के मुख्यमंत्री से पूछा इतना बड़ा हादसा हुआ क्या आपको दुख नहीं हुआ ? मोदी ने जवाब दिया कि मैं भी एक इंसान हूं, आप अगर कार में पीछे बैठे हों और कार के नीचे एक पिल्ला भी आ जाता है तो हम ड्राइवर से कहते हैं कि गाड़ी ठीक से चलाओ भाई। कहने का मतलब आदमी जब एक जानवर के मारे जाने से दुखी हो जाता है तो वो तो इंसान थे। अब मीडिया ने मोदी के बयान से “ भी “  शब्द निकाल दिया और शोर मचाने लगी  कि मोदी ने मुलसमानों की तुलना पिल्ले से की। हैरानी तब हुई कि पांच मिनट में ही कांग्रेस के एक दो नहीं कई नेता इसी शब्द को दुहराने लगे कि मोदी ने मुसलमानों को कुत्ता कहा। दिन में ये बात शुरू हुई और शाम को टीवी चैनलों पर ये बहस का मुद्दा बन गया।

इस घटना के दो दिन बाद मीडिया ने दूसरा तमाशा खड़ा कर दिया। पुणे में एक जनसभा में मोदी ने भ्रष्टाचार पर चर्चा के दौरान कहाकि जब केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार पर चोट किया जाता है तो वह  “सेक्यूलिज्म का बुर्का ”  ओढ़ लेती है। मीडिया ने मूल विषय के बजाए इस मुद्दे को साम्प्रदायिकता से जोड़ दिया और शाम को कुछ नेता और रिटायर्ड पत्रकार जिन्हें इलेक्ट्रानिक मीडिया वरिष्ठ पत्रकार कहती है, उनके साथ बहस शुरू हो गई। कई बार सोचता हूं कि मीडिया को आखिर क्या होता जा रहा है। मेरा मानना है कि अगर किसी मुद्दे को गलत ढंग से राजनेता पेश कर रहे हैं तो मीडिया को इसकी अगुवाई करके उस मामले में निष्पक्ष राय रखनी चाहिए और कोशिश होनी चाहिए कि मुद्दा भटकने ना पाए।

एक उदाहरण देता हूं। बिहार में मिड डे मील का भोजन करने से छपरा में 23 बच्चों की मौत हो गई। जिस दिन ये हादसा हुआ उसी दिन जेडीयू के नेताओं ने आरोप लगाया कि खाने में जहर मिलाया गया और ये काम एक खास राजनैतिक दल की ओर से किया गया। हालाकि जेडीयू ने पार्टी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा राष्ट्रीय जनता दय यानि लालू यादव की पार्टी पर था। मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या देश की राजनीति में इतनी गिरावट आ चुकी है कि किसी सरकार को बदनाम करने के लिए विपक्षी दल इस स्तर पर आ जाएंगे कि वो खाने में जहर मिलाकर स्कूली बच्चों को मरवा देंगे ? मैं लालू यादव का बिल्कुल समर्थक नहीं हू, लेकिन मैं इस मामले में उनके साथ खड़ा हूं। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि कम से कम राजनीतिक विरोध का स्तर अभी बिहार ही नहीं देश के किसी कोने में इस कदर नहीं गिरा है। मुझे लगता है कि यहां मीडिया को सख्त लहजे में इस बात पर कड़ा ऐतराज जताना चाहिए था, लेकिन मीडिया ने लीडरशिप नहीं ली और दो कौड़ी के नेताओं के साथ इनकी, उनकी धुन में राग मिलाती रही।

हालत ये हो गई है कि सोशल साइट पर मीडिया का मजाक बनाया जा रहा है। आप देखिए कैसे कैसे जोक्स मीडिया को लेकर सोसल साइट पर छाए हुए हैं।

नरेन्द्र मोदी. कुत्ते का बच्चा भी अगर मेरी गाड़ी के नीचे आ जाए तो मुझे दुख होगा।
मीडिया. BREKING NEWS मोदी ने दंगे में मारे  गए लोगों को कुत्ते का बच्चा कहा।

एक और

रिपोर्टर मोदी से, सर क्या आप चावल खाते हैं।
मोदी . नहीं मैं गेहूं की रोटी ज्यादा पसंद करता हूं।
मीडिया . BREKING NEWS मोदी को चावल पसंद नहीं, जो दक्षिण भारतीयों का अपमान है। क्योंकि दक्षिण में ज्यादातर लोग चावल से ही बने व्यंजन पसंद करते हैं। इतना ही नहीं सोशल साइट पर चैनल का नाम भले ना हो, लेकिन आम आदमी मीडिया को लेकर सोचता क्या है, ये तो जरूर साफ है। मीडिया के रिपोर्ट की नकल की जा रही है।

मैं फिर कहता हूं कि अभी समय है, मीडिया को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। उसे सच और झूठ का अंतर कर खुद आगे बढ़कर लीडरशिप की भूमिका निभानी होगी। दो कौड़ी के नेताओं को लेकर स्टूडियो में बहस करने से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। हैरानी इस बात पर होती है कि जब दिल्ली में राष्ट्रीय मुद्दे पर बहस होती है तो कांग्रेस जैसी पार्टी से कोई बड़ा नेता बहस में शामिल नहीं होता, औपचारिका पूरी करने के लिए चैनल वालों को लखनऊ से कभी अखिलेश प्रताप सिंह या फिर रीता बहुगुणा को बैठाना पड़ जाता है। बताइये मुद्दा बिहार का हो और कांग्रेस जैसी पार्टी से लखनऊ से एक नेता बैठा हो, ऐसी बहस का क्या मतलब है ?  इसीलिए कहता हूं ..


वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है,
तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में।
ना समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुस्तां वालों,
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।






Monday, 1 July 2013

जल - समाधि दे दो ऐसे मुख्यमंत्री को !


                        विशेष संपादकीय 


उत्तराखंड त्रासदी पर बाकी बातें बाद में ! मुझे लगता है कि नाराज देवी देवताओं को मनाने के लिए सबसे पहले विधि-विधान से पूजा पाठ कर उत्तराखंड के लापरवाह, निकम्मे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को जल-समाधि दे दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं राहत कार्य में व्यवधान पहुंचाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी सख्त सजा जरूरी है। इन दोनों को अन्न-जल त्यागने पर विवश कर इन्हें इनके आलीशान बंगलों से बाहर किसी पहाड़ी पर भेजा जाना चाहिए, जो साल भर घनघोर पहाड़ी पर कठिन तपस्या के जरिए अपने किए पापकर्मों से मुक्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करें। उत्तराखंड सरकार के बाकी मंत्रियों को क्षतिग्रस्त सड़को को दुरुस्त करने के काम में लगा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा जिस अफसर ने मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, उस अफसर को जिंदा जमीन में गाड दिया जाए तो भी ये सजा कम है। मेरा तो ये भी मानना है कि उत्तराखंड में जिस तरह भीषण तबाही हुई है, उसे फिर पटरी पर लाने के लिए दो कौड़ी के नेताओं की कोई जरूरत नहीं है, वहां सेना को ही पुनर्वास का काम भी सौंप दिया जाए, वरना ये उचक्के नेता तो पीड़ितों के लिए मिलने वाली सहायता राशि में भी लूटमार करने से चूकने वाले नहीं है।

देवभूमि में प्रकृति ने जो कहर ढाया, मैं समझता हूं कि उसे रोकना किसी के बस की बात नहीं थी। लेकिन उसके असर को कम करना, होने वाले नुकसान को कम करना, जान माल की क्षति को कम करना, प्रभावकारी ढंग से सहायता पहुंचा कर लोगों को तत्काल राहत पहुंचाना ये सब काम हो सकता था, जो नहीं हो सका। नतीजा क्या हुआ ? लगभग एक हजार लोग मारे जा चुके हैं, चार हजार के करीब लापता हैं। चूंकि इनके शव बरामद नहीं हुए हैं, इसलिए तकनीकि रूप से लापता कहा जा रहा है। मैं तो कहता हूं कि अब 15 दिन से ज्यादा समय हो चुके हैं, मान लिया जाना चाहिए कि इनकी भी मौत हो चुकी है। कई सौ गांव का अस्तित्व खत्म हो गया है, पांच सौ से ज्यादा सड़कें बह गई हैं, बिजली, पानी और संचार सेवा पूरे इलाके में लगभग ठप है। बताया जा रहा है कि तबाही वाले इलाके में जहां तहां लोगों के शव अभी भी पडे हुए हैं। हालाकि अब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है।

मैने स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा को बहुत करीब से देखा है, उन्हें खूब सुना है, उनकी कार्यशैली देखी है। लेकिन उनका बेटा इस कदर नालायक, अक्षम, झूठा, लालची, लापरवाह और निकम्मा होगा, कम से कम मैने तो सपने में भी नहीं सोचा था। पता चला है कि जिस वक्त उत्तराखंड पर ये कहर फूटा, उस दौरान मुख्यमंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र सितारगंज में एक रूसी कंपनी को सौ एकड जमीन दिए जाने के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने वाले अपने खास अधिकारी की पीठ थपथपा रहे थे।  उन्हें कुदरत के कहर की भनक तक नहीं लगी थी। जब उन्हें इस घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने प्रभावित इलाके में जाना भी ठीक नहीं समझा, उन्होंने ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि वहां कितना नुकसान हुआ है और कितने श्रद्धालु केदारनाथ के दुर्गम रास्तों में जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। मूर्ख मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने दो साथी मंत्रियों को साथ लेकर दिल्ली आ धमके। जानते हैं किस लिए, इसलिए कि उत्तराखंड में भारी तबाही हुई है, उन्हें पैकेज यानि आर्थिक मदद दी जाए।

इस दौरान बेवकूफ मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से ये मांग नहीं की कि दुर्गम इलाके में कई हजार श्रद्धालु फंसे हुए हैं, उन्हें बाहर निकालने के लिए सौ हेलीकाप्टर तुरंत भेजे जाएं। ये पट्ठा यहां दिल्ली में पैसे के लिए गिड़गिड़ाता रहा, जबकि वहां श्रद्धालु दम तोड़ते जा रहे थे। ये पैसे के लिए इतने लालायित थे कि अपनी ही सरकार पर दबाव बनाने के लिए विभिन्न न्यूज चैनलों पर जाकर घंटों वहां के हालात के बारे में बक-बक करने लगे, जबकि इन्होंने प्रभावित इलाकों का दौरा तक नहीं किया था। मुख्यमंत्री दिल्ली में जब पैसे की मांग को लेकर समय बिता रहे थे, उसी दौरान उत्तराखंड के ही कुछ वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने पार्टी आलाकमान को हालात की गंभीरता के बारे में बताया और साफ किया कि इसमें तुरंत केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करने की जरूरत है, क्योंकि मुख्यमंत्री में ऐसे मामलों से निपटने की ना क्षमता है और ना ही मजबूत  इच्छाशक्ति। बताते हैं कि इसके बाद कांग्रेस आलाकमान सख्त हुआ तो बहुगुणा दिल्ली छोड़ कर देहरादून रवाना हुए।

बहुगुणा की निर्लज्जता की खबरें वाकई इंसानियत को शर्मसार करने वाली हैं। जानते हैं 20 जून के आसपास मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को कुछ अधिकारियों के साथ स्विट्जरलैंड जाना था। 16 जून को ये हादसा हो गया, इसके बाद भी मुख्यमंत्री अपना विदेश दौरा रद्द नहीं करना चाहते थे, उन्होंने विदेश मंत्रालय और पार्टी आलाकमान को दौरा रद्द करने की कोई जानकारी नहीं दी। इधर दौरा रद्द होने की कोई जानकारी ना मिलने के कारण विदेश मंत्रालय मुख्यमंत्री की यात्रा की तैयारियों में लगा रहा। बताया जा रहा है कि इस मामले में भी उत्तराखंड के कांग्रेस नेताओं ने पार्टी हाईकमान से शिकायत की और कहाकि वैसे मुख्यमंत्री का देहरादून में रहना ना रहना कोई मायने नहीं रखता, फिर भी अगर वो स्विट्जरलैंड गए तो पार्टी की छवि खराब होगी। इसलिए उनका दौरान रद्द किया जाना चाहिए। बताते हैं ये जानकारी होने के बाद आलाकमान ने बहुगुणा से सख्त नाराजगी जाहिर की, तब जाकर दौरा रद्द किए जाने की जानकारी विदेश मंत्रालय को भेजी गई। ऐसे मुख्यमंत्री को अगर लोग कह रहे हैं कि नालायक है, कह रहे हैं कि अक्षम है, कह रहे हैं कि लापरवाह है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई गलत कह रहा है। अब कोई अक्षम, लापरवाह, नालायक है तो इसकी कानून में तो कोई सजा है ही नहीं, लिहाजा इन्हें धार्मिक रीति-रिवाज ठिकाने लगाने के लिए जल समाधि ही सबसे बेहतर उपाय है।

वैसे लापरवाह सिर्फ मुख्यमंत्री को कहा जाए तो ये भी बेमानी होगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए सोनिया गांधी की वजह से भी वहां राहत कार्य बाधित हुआ। वहां से जो जानकारी मिली अगर वो सही है तो ये केंद्र सरकार के लिए भी कम शर्मनाक नही है। पता चला है कि उत्तराखंड में जहां-तहां फंसे श्रद्धालुओं की सहायता के लिए लगाए गए सेना और प्राईवेट हेलीकाप्टर काफी देर तक उड़ान नहीं भर पाए। कारण मौसम की खराबी नहीं थी, बताया गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी इलाके का हवाई सर्वेक्षण कर तबाही का मंजर देख रही थीं। इसलिए सुरक्षा कारणों से काफी समय तक दूसरे हेलीकाप्टर उडान नहीं भर सके। अरे भाई मनमोहन और सोनिया जी आप के हवाई सर्वेक्षण से क्या फर्क पड़ने वाला है। अफसरों की टीम भेज देते, वो नुकसान का सही आकलन भी कर पाते। अब इसके लिए तो मेरे ख्याल से ये दोनों भी बराबर की सजा के हकदार हैं।

अब प्रधानमंत्री के हवाई सर्वेक्षण करने के खिलाफ भी कोई कानून तो है नहीं, अरे भाई मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं वो कहीं का, कभी भी हवाई सर्वेक्षण कर सकते हैं। लेकिन उत्तराखंड में राहत कार्य में जो बाधा पहुंची, उस मामले में सजा तो दी ही जानी चाहिए। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि धार्मिक तौर पर इन दोनों को अन्न-जल त्याग का संकल्प दिलाकर पहाड़ी पर छोड़ दिया जाए। इन्होंने मानव जीवन का अनादर किया है, इसलिए इन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए कि साल भर तक ये किसी व्यक्ति की सूरत भी नहीं देख सकेंगे। सच में ये दोनों भी कुछ इसी तरह की सख्त कार्रवाई के हकदार हैं।

सोशल साइट पर कुछ बेपढ़े लोगों ने मौसम विभाग के खिलाफ अभियान चला रखा है। मौसम विभाग के खिलाफ जोक्स बनाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब मौसम विभाग के अफसर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं तो उनकी पत्नी भी सूखने के लिए बाहर डाले गए कपड़ों को नहीं हटाती है, फिर देश के दूसरे लोग भला उनकी भविष्यवाणी पर भरोसा कैसे कर सकते हैं ? मैं तो यही कहूंगा कि जो भरोसा नहीं करते हैं वो मूर्ख हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी को सड़क छाप ज्योतिष की भविष्यवाणी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा अक्सर इसलिए रोक दी जाती है कि मौसम विभाग भविष्यवाणी करता है कि मौसम ठीक नहीं रहेगा। वहां राज्य सरकार और मौसम विभाग का तालमेल बहुत बेहतर है। यही वजह है कि अमरनाथ में ऐसे हादसे काफी कम होते हैं। इसलिए मौसम विभाग की चेतावनी की एकदम से अनदेखी करना वाकई गैरजिम्मेदारी का काम है। अब उत्तराखंड की बात करें। यहां मौसम विभाग ने बकायदा दो दिन पहले एक लिखित चेतावनी राज्य सरकार के वरिष्ठ अफसरों को भेजा। इसमें यहां तक साफ किया गया कि मौसम खराब होने वाला है, इसलिए यात्रा रोक दी जाए। लेकिन राज्य सरकार ने इस चेतावनी पर बिल्कुल गौर ही नहीं किया। मेरे लिए तो ऐसे अफसर के लिए धरती पर कोई जगह नहीं है, मै तो उसे जिंदा जमीन में गाड़ने का हुक्म दे दूं। फिर भी मैं उत्तराखंड सरकार से ये जानना चाहता हूं कि आखिर इस सबसे बड़ी लापरवाही के लिए जिम्मेदार अफसर के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई ?

अब आखिरी बात ! उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर अब भरोसा भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि इतनी बड़ी आपदा के बावजूद वो झूठ पर झूठ बोलते जा रहे हैं। एक दिन मुख्यमंत्री ने खुद ही कहाकि प्रभावित इलाके में संचार प्रणाली ठप हो गई है। अगले दिन बोले कि वो प्रभावित इलाके के जिलाधिकारियों के साथ लगातार वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए आदेश दे रहे हैं। संचार व्यवस्था ठप होने पर भी मुख्यमंत्री की वीडियो कान्फ्रेंस चालू है, वाह रे झूठे मुख्यमंत्री ! यही वजह है कि अब इन नेताओं पर हमें क्या किसी को भरोसा नहीं रह गया है। देश को लगता है कि बहुगुणा की नजर राहत कार्य के लिए मिलने वाली सहायता राशि पर है। मेरा सुझाव है कि जिस तरह कठिन हालात में देश की सेना ने लोगों की मदद की है, वहां पुनर्वास का काम भी सेना के हवाले कर दिया जाना चाहिए। एक तो पैसे का सदुपयोग होगा, दूसरे काम जल्दी हो जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इन नेताओं से खासतौर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली से तो मुझे घिन्न आ रही है।

चलते - चलते : इस घटना को अब 15 दिन बीत चुके हैं। अभी भी वहां फंसे हुए अंतिम व्यक्ति को निकाला नहीं जा सका है। मैं पूछना चाहता हूं कि हमारे पास ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए आखिर क्या तैयारी है। अब सरकार पर सवाल तो उठेगा ही, कांग्रेस ये कह कर नहीं बच सकती कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।  मैं पूरी जिम्मेदारी से कहता हूं कि इस पर खूब राजनीति होनी चाहिए, जिससे आने वाले समय में ऐसा कोई मैकेनिजम बन सके, जिससे आपदा के दौरान तुरंत जरूरतमंदों को राहत मिल सके।


महेन्द्र श्रीवास्तव

Sunday, 9 June 2013

ABP न्यूज : ये कैसा ब्रेकिंग न्यूज !

आज एक सवाल ABP न्यूज से करना चाहता हूं, जिसके महत्वपूर्ण न्यूज बुलेटिन की बुनियाद भी " सूत्र " पर जा टिकी है। मैं समझता हूं सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर कोई सामान्य खबर तो एक बार दी जा सकती है, लेकिन देश में जिस मुद्दे पर लगातार बहस चल रही हो, उस बड़ी खबर पर इतनी बड़ी लापरवाही कम से कम मेरी समझ से तो परे है। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी एक बार मामले की अनदेखी की जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हुआ ये कि गलत खबर पर एंकर राशन पानी लेकर चढ़ गया और वो दूसरों की प्रतिक्रिया लेने में पूरी ताकत से जुट गया। हिंदी पत्रकारिता उस समय और शर्मिंदा हुई, जब वरिष्ठ पत्रकारों की मंडली का एक सदस्य इस पर बहुत ही बचकानी टिप्पणी कर गया। खैर पूरी बात आगे करूंगा, पहले मुद्दे पर आता हूं। आज यानि रविवार को दोपहर डेढ़ बजे के करीब अचानक गोवा में चल रही बीजेपी की कार्यकारिणी से एक खबर ABP न्यूज ने ब्रेक की। जानते हैं खबर क्या थी ? खबर ये कि मोदी को प्रचार कमेटी का चेयरमैन नहीं बनाया जाएगा, उन्हें संयोजक बनाया जाएगा। शर्मनाक बात ये है कि 10 मिनट के बाद ही ये " ब्रेकिंग खबर " झूठी निकली, लेकिन चैनल को भला इससे क्या लेना ! खैर इस बीच क्या हुआ वो भी सुन लीजिए।

बीजेपी कार्यकारिणी को लेकर रविवार को दोपहर में एबीपी न्यूज ने एक मजमा लगा रखा था। इसमें वरिष्ठ पत्रकार ध्यान दीजिए मैं क्या कह रहा हूं, "वरिष्ठ पत्रकार" हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा के साथ ही ट्रेनी वरिष्ठ पत्रकार दिबांग के अलावा दो एक लोग और मौजूद थे। यहां बेमतलब की बातचीत के बीच अचानक टीवी पर फुल स्क्रिन मे "ब्रेकिंग न्यूज" लिखा आया। 10 सेकेंड तक ब्रेकिंग-ब्रेकिंग लिखा देख मैं भी चौकन्ना हो गया। आपको पता है ब्रेकिंग न्यूज क्या थी ? न्यूज ये थी कि " मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष नहीं संयोजक बनाया जाएगा : सूत्र "। ये खबर ब्रेक हुई होगी दोपहर में लगभग 1.20 पर। जबकि यहीं नीचे लिखा आ रहा था कि डेढ़ बजे इस मामले में अधिकारिक बयाना भी आएगा। सवाल ये उठता है कि अगर डेढ़ बजे अधिकारिक बयाना आना है तो 10 मिनट पहले ब्रेकिंग न्यूज का औचित्य क्या है ? ब्रेकिंग न्यूज भी अपने रिपोर्टर के हवाले से नहीं, वो सूत्र के हवाले से। पहले तो मैं सूत्र के हवाले से ब्रेकिंग न्यूज के ही चलाने के ही खिलाफ हूं। मेरा मानना है कि अगर चैनल किसी खबर की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है, तो पहले तो उसे ब्रेकिंग न्यूज चलाना ही नहीं चाहिए। चलिए दौड़ में आगे निकलने के लिए अगर खबर चलाई भी जाती है तो, ये माना जाना चाहिए कि अपना रिपोर्टर इस खबर पर मुहर लगा रहा है। हां वो अपने सूत्र का नाम नहीं खोलना चाहता, इसलिए नाम नहीं ले रहा है।

मुझे लगता है कि इससे आप सब ही नहीं चैनल के " संपादक जी " लोग भी सहमत होंगे। जानते हैं इस जल्दबाजी के चक्कर मे एबीपी न्यूज ने क्या-क्या गुल खिलाया ? विस्तार से बताना जरूरी है। जैसे ही एक लाइन की खबर आई कि  मोदी चेयरमैन नहीं संयोजक बनेंगे। चैनला का एंकर एकदम से उछल गया। उसकी आवाज एकाएक तेज हो गई। कहने लगा कि मोदी को बहुत बड़ा झटका लगा है। बोला ! चलिए चलते हैं सीधे गोवा और बात करते हैं अपने रिपोर्टर से। अब ये रिपोर्टर मेरा मित्र ही नहीं छोटे भाई जैसा है, इसलिए मैं नाम नहीं ले सकता। बहरहाल ब्रेकिंग न्यूज में भले ही खबर सूत्र के हवाले से कही गई हो, लेकिन रिपोर्टर ने ऐलान कर दिया कि " बीजेपी कार्यकारिणी की ये आज की सबसे बड़ी खबर है कि मोदी को अब प्रचार समिति का चेयरमैन नहीं बनाया जा रहा है। उन्हें समिति का संयोजक बनाया जाएगा। रिपोर्टर ने अपनी ओर से इसके दो तीन कारण भी गिना दिए। हास्यास्पद तो ये रहा है कि उसने पार्टी के संविधान की दुहाई देते हुए कहाकि पार्टी में संयोजक ही बनाए जाने का प्रावधान है। क्योंकि प्रचार समिति के प्रस्ताव पर अंतिम फैसला अध्यक्ष ही लेते हैं।

मैं फील्ड में काम कर चुका हूं, रिपोर्टर के दबाव को समझ सकता हूं। लेकिन चैनल के एसी बक्से में बैठे लोग कैसे बहक सकते हैं ? जब रिपोर्टर से बातचीत में ये बात साफ हो गई कि वो सारी बातें हवा में कर रहा है, कोई पुख्ता बात नहीं कर पा रहा है, उसके बाद भी चैनल इस विषय को आगे कैसे बढ़ा सकता हैं ? अच्छा मान भी लें कि चैनल अपने रिपोर्टर की बात को आगे बढा रहा है तो ये तथाकथित "वरिष्ठ पत्रकार" क्या कर रहे थे ? सबसे हल्की बात तो हिंदुस्तान टाइम्स के राजनैतिक संपादक विनोद शर्मा ने की ! वो बिना जानकारी को पुख्ता किए कमेंट देने लगे। कहाकि " खोदा पहाड़, निकले राजनाथ " ! अब क्या कहूं, एक राष्ट्रीय पार्टी के बारे में आप इतना भद्दा कमेंट किस हैसियत से करते हैं ? एक पत्रकार के नाते, आम नागरिक के नाते या फिर कांग्रेस में अटूट आस्था रखने की वजह से ? ये जवाब तो विनोद शर्मा ही दे सकते हैं । इस मजमें में एक शख्स गुलाबी शर्ट में और भी मौजूद था। वो भी खबर को पुख्ता होने का इंतजार किए बगैर जिस तरह मुद्दे पर रियेक्ट कर रहा था, लगा कि जैसे बीजेपी ने उसकी जमीन हड़प ली है। संयोजक बनाए जाने को लेकर ये पत्रकार लोग अपने अंदाज में बीजेपी का चिट्ठा खोल रहे थे, कई बार तो ऐसा भी लगा कि या तो ये लोग बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में खुद मौजूद थे, या फिर इनका पत्रकारिता से लेना देना नहीं रहा, ये कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं।


बहरहाल 10 मिनट में ही ये इतनी गंदगी कर चुके थे कि उसे समेटना आसान नहीं था। इस बीच सच्ची खबर आ गई कि " मोदी प्रचार समिति के चेयरमैन यानि अध्यक्ष होंगे" । इस खबर के बाद तो मैं इन पत्रकारों का चेहरा देखना चाहता था कि अब ये अपना बचाव कैसे करते हैं? लेकिन इनकी बात सुनकर लगा कि ये जितना खाते हैं, उससे कहीं ज्यादा उल्टी करते हैं। मैं तब और हैरान रह गया कि जब मैने देखा कि ये अपनी बातों पर शर्मिंदा होने के बजाए, पूरी चर्चा को दूसरा रूप देने में लग गए। यहां अब बारी थी ट्रेनी वरिष्ठ पत्रकार दिबांग की । दिबांग तो पत्रकार के बजाए मनोचिकित्सक ही बन गए। वो नेताओं की बाँडी लंग्वेज पढ़ने लगे और उन्होंने विनोद शर्मा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहाकि ये मौका था कि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ आनंदित होकर इस बात का ऐलान करते, लेकिन वो मायूस दिख रहे हैं, उन्होंने लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज के बाँडी लंग्वेज पर भी सवाल खड़े किए। ये भी पूछा कि राजनाथ मीडिया के सामने मोदी को साथ क्यों नहीं लाए ? सवाल ये भी उठाया गया कि नरेन्द्र मोदी को अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्हें माला पहनाया गया या नहीं,  जिस समय ये ऐलान हुआ, वहां क्या माहौल था। दिबांग जिस तरह का सवाल उठा रहे थे, सच बताऊं तो लगा नहीं कि एक पत्रकार न्यूज चैनल की बहस में ये बातें नहीं  कर रहा है, बल्कि ऐसा लग रहा था कि कोई व्यक्ति 24 अकबर रोड यानि कांग्रेस दफ्तर से पत्रकारों को संबोधित कर रहा है।

आगे बात करूं, इसके पहले दो बातें और कह दूं। ये राजनीति भी किसी को ईमानदार नहीं रहने देती। भाई कोई सरकार हिम्मत करे और सबसे पहले एक काम कर दे कि पत्रकारों और संपादकों को पद्म सम्मान न देने का फैसला कर दे, इसके अलावा ये भी ऐलान कर दिया जाए कि पत्रकारों को राज्यसभा में भी नामित नहीं किया जाएगा। केवल इतने भर से पत्रकारिता में थोड़ा बहुत बेईमानी पर अंकुश जरूर लग जाएगा। मैं देख रहा हूं कि पत्रकार भी आज पार्टी बनते जा रहे हैं। ये वरिष्ठ पत्रकार राजनीतिक दलों के प्रवक्ता से भी ज्यादा बदबू देने लगे हैं। यही वजह है कि तमाम नेता इन्हें चैनलों की चर्चा में " कुत्ता " बना देते हैं, और ये दांत निपोरते हुए चुपचाप सुनते रहते हैं। अगर आप वाकई चैनलों की चर्चा पर पत्रकारों को सुनते होंगे तो अब तक आपको पता चल गया होगा कि आजकल के तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार किस पार्टी का राशन तोड़ रहे हैं। चलिए जब गंदगी समाज में आ चुकी हो तो देश के 10 वरिष्ठ पत्रकारों के ईमान बेच देने से ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ने वाला है।

एबीपी न्यूज पर फिर वापस लौटता हूं। एबीपी न्यूज के संपादक जी ! क्या आपको नहीं लगता कि ब्रेकिंग न्यूज की विश्वसनीयता के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए ? आप एक जिम्मेदार चैनल हैं, क्या आपके न्यूज चैनल का एक आम दर्शक होने के नाते मुझे ये जानने का हक है कि इतनी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज कैसे गलत हुई ? आपने स्टूडियो में जो पत्रकारों को जो मजमा लगाया था, और उन्हें आपने ही गलत जानकारी देकर उनके मुंह से जो गाली दिलवाई, उसके लिए क्या आपने किसी की जिम्मेदारी तय की है ? पूरे आधे घंटे तक जो ड्रामा आपने क्रियेट किया, और वो बाद में गलत साबित हुआ, क्या उसके लिए देश की जनता से आपको माफी नहीं मांगनी चाहिए? आखिर में एक सवाल और ? आपने दिल्ली और गुजरात के तमाम रिपोर्टर गोवा में झोंक दिए, फिर भी इतनी बड़ी गलती हुई तो आपको नहीं लगता कि चैनल को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए ?  क्या हम विश्वास कर सकते हैं कि आगे से आप ब्रेकिंग न्यूज को लेकर ज्यादा गंभीर होगें ? अगर इतने बड़े चैनल पर हम भरोसा नहीं कर सकते तो प्लीज आप बताएं कि हम कौन सा चैनल देंखें ? जो कम से कम विश्वसनीयता के मानकों को पूरा करता हो।



Saturday, 1 June 2013

धोनी पर क्यों खामोश है मीडिया ?

देश में एक बार फिर मीडिया का गैरजिम्मेदाराना रवैया देखने को मिला। आप सबको पता है कि आईपीएल 6 में क्या नहीं हुआ ? सट्टेबाजी हुई, स्पाँट फिक्सिंग हुई, खेल को प्रभावित करने के लिए लड़कियों की सप्लाई हुई, देश के करोंडो खेल प्रेमियों के आंख में धूल झोंका गया। इतने गंभीर अपराधों का खुलासा होने के बाद तो इसके जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजने की बात होनी चाहिए थी। लेकिन देश का अपरिपक्व मीडिया श्रीनिवासन के इस्तीफे के लिए गिड़गिड़ाता रहा। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है कि क्या बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन और आईपीएल चेयरमैन राजीव शुक्ला के इस्तीफा दे देने से सब कुछ ठीक हो जाएगा ? दो महीने से जो खेलप्रेमी हजारों रुपये का टिकट लेकर मैच देख रहे थे या जो लोग मैच के दौरान सारे काम छोड़कर टीवी से चिपके रहते थे, उन्हें जो धक्का लगा है, उसकी जवाबदेही किसकी होगी? इस्तीफा हो जाने के बाद मीडिया भी खामोश होकर किनारे बैठ जाएगा। मेरा मानना है कि मीडिया ने अगर सूझबूझ और जिम्मेदारी से अपना काम किया होता तो उसके कैमरे श्रीनिवासन के आगे पीछे नहीं घूमते, बल्कि देश के करोड़ों लोगों को सरेआम ठगने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के गृहमंत्री के पीछे कैमरा घूमता दिखाई देता।  मीडिया की मांग भी ये होनी चाहिए थी कि दर्शकों से वसूले गए टिकट के पैसे वापस किए जाएं और बीसीसीआई और आईपीएल से जुड़े अधिकारियों को जेल भेजा जाए।

मैं कई बार मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया के कामकाज के तरीकों पर सवाल उठा चुका हूं। मेरा मानना है जल्दबाजी और अनुभवहीनता के चलते मीडिया बगैर जाने समझे कुछ भी शोर मचाने लगती है। हफ्ते भर से ज्यादा हो गया, ये सब एक प्राईवेट संस्था के अध्यक्ष से इस्तीफा मांग रहे है। मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि इस्तीफे से भला क्या हो जाएगा ? क्या  क्रिकेट को जो धक्का लगा है, क्रिकेट प्रेमियों के विश्वास को जो छला गया है, वो ठीक हो जाएगा ? चलिए मान लीजिए श्रीनिवासन ने इस्तीफा दे दिया और जेटली अध्यक्ष बन गए ! इससे क्या बदल जाएगा ? मुझे पक्का यकीन है मीडिया ने अगर इस विवादित, ढीठ, गैंडे की खाल ओढ़े श्रीनिवासन के बजाए केंद्र सरकार के खिलाफ एकजुट होकर ऐसा अभियान चलाया होता तो शायद आज क्रिकेट की तस्वीर बदल गई होती। देश भर के क्रिकेट प्रेमियों की आंख में जिस तरह से धूल झोंका गया और आईपीएल के मैंचो में सट्टेबाजी, फिक्सिंग हुई, ये एक संगठित अपराध की श्रेणी में है। इसमें खिलाड़ी, टीम के मालिक, अंपायर और बुकीज सब मिले हुए है। इन सबको जेल होनी चाहिए। लेकिन मीडिया यहां अपनी कम जानकारी की वजह से चूक गया, जिसका फायदा निश्चित ही बीसीसीआई को हुआ। मीडिया ने अपनी पूरी ताकत एक गैंडे जिसका कोई वजूद नहीं, उसके खिलाफ लगा दिया।

मैं ये भी जानता हूं एक दो दिन में श्रीनिवासन का इस्तीफा हो जाएगा। सभी न्यूज चैनल इसे अपनी जीत बताने लगेंगे। न्यूज चैनलों पर पहले मैं, पहले मैं की होड़ लग जाएगी। और इस  गंभीर मुद्दे की यहीं हत्या हो जाएगी। राजस्थान रायल्स की टीम के कुछ खिलाड़ी स्पाँट फिक्सिंग में धरे गए, उसके बाद बीसीसीआई ने उन पर दबाव बनाया कि वो भी खिलाड़ियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराएं। बीसीसीआई के कहने पर राजस्थान टीम मैनेजमैंट ने अपने खिलाड़ियों के खिलाफ खुद भी रिपोर्ट दर्ज करा दिया। मेरा सवाल है कि चेन्नई सुपर किंग को बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन ने क्यों नहीं कहा कि वो अपने मालिक यानि गुरुनाथ मयप्पन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराएं ? बस इसीलिए ना कि चेन्नई सुपर किंग के बाप जी यानि श्रीनिवासन खुद बीसीसीआई के अध्यक्ष हैं ? आईपीएल का नियम है कि अगर किसी फ्रैंचाइजी का मालिक गलत काम में शामिल पाया जाता है तो उस टीम को ब्लैक लिस्टेड कर दिया जाना चाहिेए। चेन्नई टीम के मालिक मयप्पन को तो पुलिस ने गिरफ्तार तक कर लिया, फिर भी उसे आईपीएल में आज तक क्यों बनाए रखा गया ? मीडिया ने ये सवाल आज तक नहीं उठाया।

आजकल मीडिया नैतिकता पर बहुत जोर दे रही है। जिससे भी इस्तीफा मांगना होता है, उसे नैतिकता के कटघरे में खड़ा कर देती है और इस्तीफे की मांग शुरू हो जाती है। मैं कहता हूं कि नैतिकता अपेक्षा भारतीय टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी से क्यों नहीं होनी चाहिए ? आपको इसकी वजह जाननी है तो मैं गिनाता हूं। भारतीय टीम के कप्तान धोनी बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन की कंपनी इंडिया सीमेंट में वाइस प्रेसीडेंट हैं। पहले वो एयर इंडिया में थे,  लेकिन श्रीनिवासन जब बीसीसीआई के अध्यक्ष बने और चेन्नई सुपर किंग टीम उन्होंने ली, तब धोनी एयर इंडिया से इस्तीफा देकर उनकी कंपनी से जुड़ गए । श्रीनिवासन के दामाद जो सट्टेबाजी के आरोप में गिरफ्तार है, उसका बयान है कि वो सट्टा लगाने से पहले धोनी से राय लिया करता था। इतना ही नहीं जिस सट्टेबाज विंदु दारा सिंह पर गंभीर आरोप लगा है कि वो सट्टेबाजी करता था, स्पाँट फिक्सिंग में उसका हाथ था, बुकीज के संपर्क में था, लड़कियों की सप्लाई करता था, वो विंदु धोनी और उनकी पत्नी का अभिन्न मित्र है। स्टेडियम में विंदु दारा सिंह भारतीय टीम के कप्तान धोनी की पत्नी साक्षी के साथ बैठ कर आईपीएल का मैच देख रहा था। मेरा सवाल है कि साक्षी क्यों विंदु दारा सिंह के साथ मौजूद थी ? वहां तो बहुत सारे सलेबिटीज मौजूद होते हैं, फिर विंदु ही क्यों ? क्या यहां नैतिकता का तकाजा नहीं है कि धोनी सफाई दें और जब तक मामले की जांच पूरी ना हो जाए वो कप्तानी छोड़ दें। छोटे मोटे खिलाड़ियों को पकड़ना और जेल में डालना आसान है, लेकिन धोनी जैसों पर हाथ डालने में सब सौ बार सोचते हैं। लेकिन बात नैतिकता की है तो धोनी भी नैतिक नहीं रह गया है।

मुझे लगता है कि अगर आज मीडिया ने केंद्र सरकार को निशाने पर लिया होता तो अब तक तस्वीर बदल चुकी होती। आप सब जानते हैं कि सरकार को देश के तमाम मंदिरों का अधिग्रहण करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। जैसे माता वैष्णों देवी, माता विंध्यवासिनी देवी, बाबा विश्वनाथ, तिरुपति बाला जी समेत सैकड़ों ऐसे मंदिर हैं, जिसका अधिग्रहण करने में सरकार को कोई हिचक नहीं रही। लेकिन बीसीसीआई जिसके खिलाफ बेईमानी के पुख्ता सबूत मौजूद है, उसके खिलाफ कार्रवाई में सौ बार सोचना पड़ रहा है। अगर सरकार में इच्छाशक्ति होती तो अब तक बीसीसीआई के मुख्यालय मुंबई में तालाबंदी हो चुकी होती। बीसीसीआई को भंग कर सरकार इसे अपने नियंत्रण में ले चुकी होती। लेकिन इसमें मुश्किल ये है कि बीसीसीआई में काग्रेस और बीजेपी के नेता ही नहीं बल्कि सरकार के सहयोगी दलों के भी तमाम नेता शामिल हैं। क्रिकेट एक ऐसा मामला है जहां हमाम में सभी नंगे हैं। बताइये गुजरात के मुख्यमंत्री जो बीजेपी से प्रधानमंत्री पद के लिए सशक्त दावेदारों में हैं, वो भी बीसीसीआई के आगे ऐसे दबे हुए हैं कि पूरे मामले में एक बार भी मीडिया के सामने नहीं आए। ऐसे नेता जब भ्रष्टाचार को लेकर आग उगलते हैं तो उनकी जुबान से बदबू आने लगती है। जेटली साहब की क्या बात है,  राज्यसभा में इनकी बड़ी-बड़ी बाते सुन लीजिए। लेकिन श्रीनिवासन के मामले में उसका तलुवा चाटते नजर आए। बिल्कुल बोलती बंद थी।

आपको पता है कि जब बात होती है कि बीसीसीआई को आरटीआई में शामिल किया जाए। यानि ये संस्था भी देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह हो। जो जानकारी आम आदमी चाहता है वो देने को बीसीसीआई मजबूर हो। इस पर कहा जाता है कि बीसीसीआई गैरसरकारी संस्था है, इसलिए इस पर आरटीआई नहीं लागू हो सकती। इन गैंडो से कोई पूछे कि इन पर सट्टेबाजी, स्पाँट फिक्सिंग, लड़कियों का शोषण ये सब इस्तेमाल करने की छूट है? आपको पता है कि खिलाडियों को अगर कोई सम्माम दिया जाता है तो उसकी प्रक्रिया क्या है ? मैं बताता हूं । देश में लगभग 40 खेलसंघ सरकार के खेल मंत्रालय से मान्यता प्राप्त है। पुरस्कार देने के लिए ये संघ ही खिलाड़ियों का नाम प्रस्तावित करते हैं, तभी खिलाड़ियों को पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार या अन्य राष्ट्रीय सम्मान मिलता है। लेकिन आज तक तमाम क्रिकेटर्स को राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है, कोई पूछे कि इनके नाम की सिफारिश किसने की ? पता चल जाएगा, यही विवादित बीसीसीआई इनका नाम भेजती है और हमारी सरकार उसे मान भी लेती है। मेरा सवाल है कि जब सरकार की बात मानने के लिए बीसीसीआई बाध्य नहीं है, तो इनके भेजे नाम पर राष्ट्रीय पुरस्कार भला कैसे दिए जा सकते हैं ? जवाब यही है कि हमाम में सब नंगे हैं।

सच कहूं ! बहुत सारी वजह हो सकती है जिससे बीसीसीआई पर नकेल कसी जा सके। लेकिन इस गोरखधंधे में लगभग सभी राजनीतिक दल के लोग शामिल हैं। इसलिए आज तक ये धंधा यूं ही चलता चला आ रहा है। दरअसल मीडिया की मजबूरी है, उसे लगता है कि देश में क्रिकेट बिकता है, इसलिए उसे क्रिकेट की खबरें दिखाना मजबूरी है। मै पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मीडिया ने श्रीनिवासन के इस्तीफे को लेकर जिस तरह की एकजुटता दिखाई है, अगर यही एकजुटता बीसीसीआई पर लगाम कसने को लेकर दिखाती तो अब तक इसमें काफी सुधार हो चुका होता। वैसे अब ये मुद्दा गरम है, मीडिया को यहां ईमानदार होना पडेगा, उसे भूल जाना होगा कि धोनी उन्हें इंटरव्यू देता है या नहीं, बीसीसीआई के अधिकारी उन्हें अपने पास बैठाते हैं या नहीं। निष्पक्ष होकर वो बात करनी होगी, जिससे क्रिकेटप्रेमी कभी निराश ना हों। अगर मीडिया को लगता है कि आईपीएल में चीयरगर्ल यानि महिलाओं का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, तो इसी तरह एकजुटता दिखानी होगी। वरना तो इस खेल में सट्टेबाजी, स्पाँट फिक्सिंग और लकडीबाजी यूं ही चलती रहेगी।






Wednesday, 22 May 2013

मीडिया : सरकार के खिलाफ हल्ला बोल !



लोकसभा का चुनाव कब होगा, ये अभी तय नहीं है, यूपीए में कौन से दल शामिल रहेंगे, ये भी तय नहीं है, एनडीए की मुख्य सहयोगी पार्टी जेडीयू का क्या रुख होगा, तय नहीं है। बात तीसरे मोर्चें की भी बहुत हो रही, इसमें कौन कौन शामिल होगा, जिम्मेदारी से कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन मीडिया ने सरकार के भविष्य का फैसला सुना दिया। एक जाने माने न्यूज चैनल ने अपने सर्वे में साफ किया है कि इस बार यूपीए का प्रदर्शन निराशाजनक रहेगा, खासतौर पर कांग्रेस का प्रदर्शन तो और भी बुरा होगा। वहीं एनडीए और बीजेपी के प्रदर्शन को बेहतर तो बताया गया है, लेकिन ये भी कहा गया है कि बहुमत एनडीए को भी नहीं मिलेगा। हालाकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही अभी प्रधानमंत्री पद के लिए किसी नेता का नाम आगे नहीं किया है, लेकिन मीडिया ने इस बात पर भी सर्वे कर लिया और कहाकि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी 36 फीसदी से ज्यादा लोगों की पहली पसंद हैं, जबकि  राहुल गांधी को महज 16 फीसदी लोग भी पसंद करते हैं। आईबीएन 7 के सर्वे में 65 फीसदी से ज्यादा लोग कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधे जिम्मेदार मानते हैं, मसलन मिस्टर क्लीन अब साफ सुथरे बिल्कुल नहीं रह गए। अच्छा मीडिया ने और विपक्ष यानि बीजेपी ने एक काम तो बढिया किया, कि उन्होंने यूपीए-2 के चार साल के कामकाज पर रिपोर्ड कार्ड पहले ही जारी कर दिया, वरना सरकार ने जो रिपोर्ट कार्ड पेश किया है, उसमें भी ईमानदारी नहीं दिखाई दे रही है।

अपनी बात शुरू करें, इसके पहले चैनलों के सर्वे पर एक नजर डाल लेते हैं। एबीपी न्यूज- नील्सन के सर्वे की माने तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 116 सीटों पर सिमट जाएगी,  मतलब उसे 90 सीटों का नुकसान होगा। लेकिन इससे बीजेपी को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस के इस नुकसान का फायदा छोटी और क्षेत्रिय पार्टियों को ज्यादा होगा। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार एनडीए को 27 सीटे ज्यादा मिलेगी, जबकि तीसरे मोर्चे की छोटी-छोटी पार्टियों को 68 से भी ज्यादा सीटों का फायदा होने वाला है।  भाजपा अखिल भारतीय स्तर पर सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरने वाली है। सर्वे के मुताबिक भाजपा को 137 मिल सकती है, तो कांग्रेस 206 सीटों से घट कर 116 पर आ गिरेगी। मतलब साफ है कि उसे 90 सीटों का नुकसान होने जा रहा है। अगर बीजपी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट करती है तो भाजपा की सीटे बढेगी। छोटी सी चर्चा यूपी की कर दें, अभी यूपी में कांग्रेस के पास 21 सीटें है, सर्वे बता रहा है कि अगले चुनाव में सिर्फ सात रह जाएंगी। सर्वे रिपोर्ट में एक दिलचस्प जानकारी है, पिछली लोकसभा चुनाव में दिल्ली में बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिली थी, इस बार चुनाव में कांग्रेस को यहां से एक भी सीट नहीं मिलने वाली है। मतलब दमदार नेता कपिल सिबब्ल की भी कुर्सी गई।

दूसरा सर्वे मैं अपने चैनल आईबीएन 7 का बता दूं। IBN7 और GFK-mode ने देश के 12 शहरों में 2466 लोगों से पूछे यूपीए-2 के चार साल के कार्यकाल पर कुछ अहम सवाल। इसके लिए पहले लोगों से सरकार और उसके मुखिया से जुड़े सवाल पूछे गए। नतीजा बताऊं, देश में ऐसी नाराजगी है सरकार को लेकर जो इसके पहले किसी भी सरकार के खिलाफ नहीं देखी गई। मसलन 68 फीसदी लोग चाहते हैं कि इस सरकार को सत्ता में बने रहने का अब कोई हक नहीं है। और तो और मिस्टर क्लीन बोले तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 65 फीसदी लोग कोयला घोटाले के लिए सीधे जिम्मेदार मानते हैं। बड़ा बुरा वक्त है प्रधानमंत्री जी। इतना गंभीर आरोप इसके पहले किसी प्रधानमंत्री पर नहीं लगा। बोफोर्स वगैरह तो फिर भी ठीक था, कोयले की कालिख ने तो सच में सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आईबीएन 7 के सवाल पर जवाब सुन लीजिए। 71 फीसदी ने कहा भ्रष्टाचार बढ़ा है, 20 फीसदी ने कहा जस का तस, 8 फीसदी मानते हैं कि भ्रष्टाचार घटा है, धन्य हैं प्रभु, कुछ लोग ये मानते तो हैं कि भ्रष्टाचार कम हुआ है। मंहगाई के बारे में पूछे गए सवाल पर 51 फीसदी ने कहा महंगाई तो बढ़ी है, 43 फीसदी का कहना है पहले जैसी ही है, 5 फीसदी लोगों की नजर में हर चीज का दाम बढ़ा है। पूछा गया कि क्या कोयला घोटाले के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं ? भाई 65 फीसदी ने हां में सिर हिलाया, लेकिन 28 फीसदी लोग प्रधानमंत्री के साथ भी हैं, उन्होंने कहा बिल्कुल नहीं। एक सवाल और हुआ कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय कोयला और टूजी घोटालों को दबा रहा है? यहां भी प्रधानमंत्री के खिलाफ ही जवाब आया। 64 फीसदी ने कहा हां, 25 फीसदी ने कहा नहीं,11 फीसदी का कहना है पता नहीं। आखिरी सवाल हुआ प्रधानमंत्री को लेकर, पूछा गया कि अगला प्रधानमंत्री कौन हो ? जवाब चौंकाने वाला रहा, 56 फीसदी ने कहा नरेंद्र मोदी जबकि सिर्फ 29 फीसदी का कहना है राहुल गांधी। जाहिर है झटका सिर्फ यूपीए सरकार को ही नहीं कांग्रेस के युवराज और प्रधानमंत्री पद के दावेदार के लिए भी है।

बहरहाल सर्वे तो कई और न्यूज चैनल और समाचार पत्रों ने भी किया है। कमोवेश इसी तरह के सवाल हैं और जवाब भी मिलते जुलते ही हैं। लेकिन अहम सवाल ये है कि आखिर अभी जब चुनाव की तारीख तय नहीं, गठबंधन की सूरत साफ नहीं, उम्मीदवार कौन होगा, ये पता नहीं, तो इस सर्वे की विश्वसनीयता भला क्या हो सकती है ? मैं तो एक और सवाल पूछना चाहता हूं कि आखिर मीडिया में हो रही इस बेमौसम बरसात की वजह क्या है। वैसे सच तो ये है कि किसी एक चैनल ने कुछ शुरू किया तो यहां प्रतियोगिता शुरू हो जाती है,  कौन पहले सर्वे कर लेता है। सर्वे में क्या क्या बातें बता देता है। यही एक ऐसा मामला है कि यहां कोई पिछड़ना नहीं चाहता। बहरहाल अगर आप व्यक्तिगत रूप से मेरी राय जानना चाहें तो मैं इसे बेमतलब का काम समझता हूं। मैं तो ऐसे सर्वे को "राजनीति का आईपीएल" ही समझता हूं। मतलब बाहर से ये आपका खूब मनोरंजन करेगा, लेकिन इसके अंदर क्या है, इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। सच कहूं तो इस बात का जवाब किसी भी मीडिया संस्थान के पास नहीं होगा कि जब राजनीतिक दलों ने अभी कुछ भी तय ही नही किया है तो ऐसे सर्वे पर भरोसा कैसे किया जा सकता है?  ना अभी राहुल गांधी को कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित किया है और ना ही नरेन्द्र मोदी को बीजेपी ने। ऐसे मे इन दोनों को केंद्र में रखकर किया गया सर्वे कितना भरोसे मंद होगा, ये तो मीडिया से जुड़े जिम्मेदार लोग ही बता सकते हैं। खैर मीडिया संस्थानों को अगर ऐसे सर्वे से खुशी मिलती है तो हमें आपको भला क्यों तकलीफ होनी चाहिए। आप भी देखते रहिए राजनीति का आईपीएल।

वैसे बड़ी बात ये है कि सरकार पर विपक्ष का हमला तो होता रहता है, लेकिन आज सरकार के खिलाफ मीडिया जिस तरह हमलावर है। कम से कम ये तो सरकार के लिए खतरे की घंटी ही कही जाएगी। ऐसे में सवाल ये है कि माहौल के मुताबिक सरकार कुछ सबक ले भी रही है या नहीं ! मैं तो यही कहूंगा कि मीडिया भले गैरजिम्मेदारी के साथ पेश आ रही हो, लेकिन सरकार को उन मसलों पर गहराई से विचार करना ही होगा, जो मामले मीडिया की सुर्खियों में हैं। इतना तो तय है कि ये सरकार अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है, मंत्रियों की करतूतों से सरकार का चेहरा दागदार है। बहुत जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि आज पीएम के पद की गरिमा तार-तार हो चुकी है। इस पद की हैसियत एक घरेलू नौकर से ज्यादा की नहीं रह गई है। लगता ही नहीं मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं, पहली नजर में तो यही दिखाई देता है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री का काम दिया गया है, जिसे वो एक नौकरशाह की तरह करने की कोशिश भर कर रहे हैं। ना वो नेता हैं और न ही उनमें नेतृत्व  का कोई गुण दिखाई दे रहा है।

वैसे सरकार के कामकाज पर उंगली उठाने का हक कम से कम आज मीडिया को तो नहीं रह गया है। देखा जा रहा है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों पर कुछ चुनिंदा लोगो के विचारों को थोपने की साजिश की जा रही है। एक तो ये " वरिष्ठ पत्रकार " का तमगा चैनल वाले ऐसे बांटते हैं कि पूछिए मत। सच कहूं तो ये पत्रकार कम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि ज्यादा लगते हैं। कोई कांग्रेस से जुड़ा है, तो कोई बीजेपी में आस्था रखता है। कुछ का तो छोटे मोटे राजनीतिक दलों से ही दाना-पानी चल रहा है। आज मीडिया में काफी अत्याधुनिक तकनीक इस्तेमाल की जा रही है, सच कहूं तो पुराने लोग अब इस तकनीक के साथ चल नहीं पा रहे हैं, लिहाजा वो मजबूर हो जाते हैं नौकरी छोड़ने के लिए। अखबार या चैनल से नौकरी जाते ही वो बन जाते हैं वरिष्ठ पत्रकार। अच्छा इतने ज्यादा चैनल हो गए हैं कि उन्हें शाम की पंचायत के लिए राजनीतिक गेस्ट मिलते ही नहीं। ऐसे में मजबूरी हो जाती है कि कुछ पत्रकारों से ही काम चला लिया जाए। सच्चाई ये है कि चैनलों को अगर अच्छे गेस्ट मिल जाएं तो बेचारे "वरिष्ठ पत्रकार" को कोई पूछने वाला नहीं है।

अच्छा सम्मान किसे अच्छा नहीं लगता। चैनल के चौपाल में अगर एंकर उन्हें आठ-दस बार वरिष्ठ पत्रकार कह कर संबोधित करता है तो ये छोटी बात तो है नहीं। आपको नहीं पता  होगा, लेकिन जान लीजिए जैसे नेता लोग टिकट पाने के लिेए अखबारों की कटिंग लगाकर आवेदन करते हैं, वैसे ही पत्रकार जी लोग भी "पद्मश्री"  हासिल करने के लिेए इन पंचायतों की सीडी बनाकर नेताओं को सुनाते हैं, कहते हैं कि देखिए चुनाव के पहले से हम आपके बारे में कितनी बढ़िया-बढिया बातें करते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार लोग अपने संस्थान में नौकरी पक्की करने के लिए ये "पद्मश्री" अखबार के मालिक को भी दिलाते रहते हैं। खैर मैं विषय से भटक रहा हूं, पर मेरा मानना है कि पत्रकारिता की पवित्रता को बनाए रखने के लिए पद्मम् सम्मान से पत्रकारिता की श्रेणी को तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया जाना चाहिए। इससे कम से कम कुछ हद तक सत्ता की दलाली पर रोक लग सकेगी। मैं पदम सम्मान हासिल किए हुए वरिष्ठ पत्रकारों को जब चैनलों की पंचायत में सुनता हूं तो मुझे उनकी सोच पर हैरानी होती है, फिर लगता है कि दोष इनका नहीं है, ये तो सिर्फ कर्ज उतार रहे हैं। लेकिन जिन्हें ये सम्मान अभी नहीं मिला है, वो तो इसे हासिल करने के लिए सारी मर्यादाएं तार-तार कर देते हैं। बहरहाल यूपीए की सरकार का क्या होगा ? ये तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इतना तो सच है कि मीडिया ने सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया है।


Thursday, 9 May 2013

ये है मैडम सोनिया की मीडिया !


आज एक राज की बात बताता हूं, मैं सोनिया गांधी को नेता नहीं मानता था, मुझे लगता था कि उन्हें बतौर मृतक आश्रित कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी मिली है और अपना काम ईमानदारी से भले ना करें लेकिन मेहनत से तो करती हैं। लेकिन दो दिन से उनका मीडिया मैनेजमेंट देखकर हैरान हूं। इतना ही नहीं मेरी ये धारणा भी बदल गई है कि वो राजनीति नहीं जानती हैं, उनमें नेता की काबीलियत नहीं हैं। भाई वो ना सिर्फ राजनीति को समझती हैं, बल्कि अपनी ही सरकार और पार्टी से राजनीति करती भी हैं। अब देखिए ना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इमेज एक ईमानदार प्रधानमंत्री की थी, आज पूरा देश उन्हें "चोर" कह रहा है, उनकी ईमानदारी सवालों के घेरे में है। रेलमंत्री पवन कुमार बंसल की चोरी पकड़े जाने से पूरी पार्टी कटघरे में है। कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने सीबीआई के काम में दखल देकर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी मोल ले ली है। अगर मैं ये कहूं कि ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरी सरकार इस समय मुंह काला कराए घूम रही है तो गलत नहीं होगा ? इसके उलट सोनिया गांधी खुद ईमानदार और साफ-सुथरी बनी हुई हैं, वजह जानते हैं। कांग्रेस के कुछ बड़े नेता मीडिया को इस्तेमाल कर रहे हैं और कहा जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण से सोनिया गांधी बहुत दुखी हैं, पार्टी की क्षवि खराब होने से वो प्रधानमंत्री से भी नाराज हैं और वो चाहती हैं को दोनों मंत्रियों का इस्तीफा लिया जाए, लेकिन प्रधानमंत्री चोर मंत्रियों को बचा रहे हैं। सोनिया जी क्यों भूल गईं कि पार्टी की क्षवि तो उनके दामाद राबर्ट वाड्रा की वजह से भी खराब हो रही थी, उस वक्त आपने नाराजगी नहीं जताई। हाहाहहा..यानि मीठा मीठा गप्प, कडुवा-कडुवा थू।

अब देखिए दो तीन दिन से मीडिया में एक चर्चा शुरू हुई है, वो है " नैतिकता " की। अच्छी बहस है, समय-समय पर होनी चाहिए, ये बहस सुनने में भी अच्छी भी लगती है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आज मीडिया को नैतिकता की अपेक्षा किससे है ? केंद्र सरकार के बेचारे दो गरीब मंत्रियों पवन बंसल और अश्वनी कुमार से, जिनकी चोरी पकड़ी जा चुकी है। इन दोनों का तो जीना मुहाल हो गया है, देश तो उन्हें चोर कह ही रहा है, परिवार में भी वो चैन से नहीं रह पा रहे हैं। पता चला हैं पूरे दिन उनके रिश्तेदारों के फोन आ रहे है, सब शोक जता रहे हैं। बेटियां ससुराल से घर आ गई हैं, उन्हें लगता है कि पापा जब मुश्किल में हों तो उस वक्त बेटी का घर में रहना जरूरी है, इससे पापा को ताकत मिलती है। लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि मीडिया को "नैतिकता" की अपेक्षा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से क्यों नहीं है ?सब को पता है कि कानून मंत्री अश्वनी कुमार की गल्ती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने कोल ब्लाक आवंटन के मामले में सीबीआई की जांच रिपोर्ट को देखा और उसमें कुछ फेरबदल कराया। इस मामले का खुलासा हो जाने से बेचारे कानून मंत्री का सुप्रीम कोर्ट ने धुआं निकाल दिया है।

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कानून मंत्री सीबीआई की जांच रिपोर्ट या तकनीकी भाषा में कहें  स्टेट्स रिपोर्ट आखिर क्यों चेक कर रहे थे ? अपने कानून मंत्री कभी कोयला मंत्री तो रहे नहीं है, फिर कोल ब्लाक आवंटन के मामले में उनका डायरेक्ट या इनडायरेक्ट कोई हाथ भी नहीं रहा है। सब जानते हैं कि उनकी कोशिश तो सिर्फ यही थी कि बेचारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुंह पर कोयले की कालिख ना पुते। क्योंकि कोल ब्लाक आवंटन के मामले में घोटाले का खुलासा विपक्ष ने नहीं बल्कि संवैधानिक संस्था सीएजी ने किया है। कहा गया कि कोल ब्लाक आवंटन में गडबड़ी के चलते देश को एक लाख 86 हजार करोड़ का नुकसान हुआ। जिस समय ये कोल ब्लाक आवंटित किए गए, उस समय कोयला मंत्रालय अपने ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था। अगर सीबीआई की जांच में ये पाया जाता है कि कोल ब्लाक आवंटन में गडबड़ी हुई तो इसके लिए कानून मंत्री को तो कोई सजा होनी नहीं थी, अगर किसी को सजा मिलती भी तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मिल सकती है। इससे इतना तो साफ है कि कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने जो कुछ भी किया वो सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह का चेहरा काला होने से बचाने के लिए किया। ऐसे में हमें नैतिकता की अपेक्षा अश्वनी कुमार से ही क्यों होनी चाहिए, प्रधानमंत्री से क्यों नहीं होनी चाहिए ?

खैर ! सोनिया गांधी की बात पूरी कर लूं, फिर इस मुद्दे को आगे बढाता हूं। सोनिया जी आप से सीधी बात करना चाहता हूं। मेरा मानना है कि आप खुद को बुद्धिमान समझे, इसमें मुझे या देश के किसी भी नागरिक को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन आप हमें और देश को मूर्ख समझेंगी तो भला ये हम कैसे बर्दाश्त सकते हैं ? आपके कुछ खास चंपू नेताओं के जरिए बार-बार मीडिया में एक संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि आप इस पूरे प्रकरण से दुखी है, आप चाहती हैं कि दागी मंत्री यानि अश्वनी कुमार और पवन कुमार बंसल इस्तीफा दे दें। दो दिन से ये बात लगातार टीवी चैनलों के जरिए सुन रहा हूं। लेकिन आपके चाहने के बाद भी ये मंत्री इस्तीफा देने को तेयार नहीं है। इतना ही नहीं, ये संदेश भी देने की कोशिश की जा रही है कि मंत्रियों के इस्तीफे को लेकर आप में और प्रधानमंत्री में खट-पट हो गई है। मसलन आप तो जहां चोर मंत्रियों को हटाना चाहती हैं वहीं प्रधानमंत्री इन्हें बचाना चाहते हैं, इसीलिए अभी तक उन्होंने इस्तीफा नहीं लिया। सोनिया जी माफ कीजिएगा, पर एक बात बताएं, आप इस वक्त इटली में नहीं है, अभी आप इंडिया में है। सब को पता है कि अगर आप ने सिर्फ आंख भर दिखा दिया ना, तो छोटे-मोटे मंत्रियों की तो बात ही अलग है, देश के प्रधानमंत्री का पैजामा भी गीला हो जाएगा। और आप हैं कि देश को ये संदेश देना चाहती हैं कि आपकी कोई सुन नहीं रहा है। कमाल है आप चाहती हैं कि दागी मंत्री इस्तीफा दें, लेकिन प्रधानमंत्री उन्हें बचा रहे हैं। आपके ऐसे ही घटिया सलाहकारों की वजह से सरकार और पार्टी की छीछालेदर देश और दुनिया मे हो रही है।

चूंकि आज देश में नैतिकता पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है, इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जिक्र करना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी एक बात बताइये, आपका मंत्रिमंडल चोरों की जमात है और आप उसके सरदार। क्या कभी भी आपको लगा कि इन चोरों की जमात से छुटकारा पाना चाहिए ? मैंने कांग्रेस के कई बड़े नेताओं से पूछा कि आखिर सोनिया गांधी को मनमोहन सिंह में क्या दिखाई दिया जो उन्होंने इन्हें प्रधानमंत्री बना दिया। इसका जवाब किसी नेता के पास नहीं है, सब चुप हो जाते हैं। अब एक बात जो मेरी समझ में आ रही है, वो ये कि शरीर में सबसे महत्वपूर्ण हड्डी यानि रीढ की हड़्डी देश के प्रधानमंत्री में नहीं है, मुझे तो नहीं लगता कि इसके अलावा उनमें कुछ और खास क्या है। लेकिन सवाल ये कि अगर रीढ की हड्डी ना होना ही प्रधानमंत्री पद की योग्यता है तो मैं कांग्रेस के कई दिग्गजों को जानता हूं जिनके पास ये हड्डी नहीं है। खैर छोडिए ! अगर मैडम सोनिया का आशीर्वाद मिले तो पार्टी का कोई भी नेता ये हड्डी निकलवाने के लिए तैयार हो जाएगा। ऐसे में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को ही क्यों चुना ?  ये बात आज भी पार्टी में पहेली बनी हुई है। बहरहाल अब इनके बारे में जानने की ज्यादा जरूरत नहीं है, क्योंकि देश देख रहा है कि ये मन मोहन हैं, इसीलिए प्रधानमंत्री हैं।

कहते हैं ना जब दिन बुरा हो तो आदमी हाथी पर बैठा हो, फिर भी उसे कुत्ता काट लेता है। सरकार ऐसे ही मुश्किल में है अब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे में बंद ऐसा तोता बता दिया जो अपने मालिक की भाषा बोलता है। माननीय कोर्ट को बता दूं कि राजनीति में तोते और तोतेबाज ही कामयाब हैं। कांग्रेस ने सिर्फ सीबीआई को ही तोता नहीं बनाया, बल्कि जो भी उनके आस-पास है, सब तोता बनकर ही उनके नजदीक रह सकते हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप होने के बाद भी प्रधानमंत्री मजे में हैं, अश्वनी कुमार और पवन कुमार बंसल से इस्तीफा लेने की उनकी हैसियत नहीं है। किस मुंह से कहेंगे कि आप इस्तीफा दो, इन मंत्रियों से ज्यादा गंभीर आरोप तो उन पर खुद हैं। लेकिन टूजी के मामले में ए राजा को छोडिए, करुणानिधी की बेटी तक को जेल भेज दिया, लेकिन बेचारे करुणानिधि तोता बने रहे। सपा मुखिया सड़क पर खुलेआम सरकार को गाली देते हैं, पर संसद मे तोता बन जाते हैं। यही हाल बहन मायावती का है। बताते हैं कि सरकार ने सीबीआई को ना सिर्फ तोता बनाया है, बल्कि राजनेताओं को कैसे तोता बनाए रखना है ये गुर भी सिखा दिया है। इसीलिए मुलायम और माया सीबीआई के तोते बने रहते हैं। बेशर्मी की हद तो ये है कि कांग्रेसी इन्हीं तोतों की वजह से विपक्ष को चुनौती दे रहे हैं। कह रहे हैं कि अगर विपक्ष को लगता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है तो वो सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव क्यों नहीं लाते ? हाहाहाहा, अब इसका जवाब भला कौन दे सकता है। इशारों में तो मुलायम सिंह यादव कह चुके हैं कि अगर सरकार के खिलाफ बात करो तो ये सीबीआई को हमारे पीछे लगा देते हैं। अब इससे ज्यादा भला कोई क्या कह सकता है।

मुझे लगता है कि कर्नाटक के चुनावी नतीजों का कांग्रेस को बेसब्री से इंतजार था। उसे पता था कि कमजोर, बेईमान, भ्रष्ट और ना जाने क्या क्या बताकर जो मीडिया केंद्र की सरकार को आज कटघरे में खड़ा कर रही है, चुनाव नतीजों के बाद यही मीडिया सरकार के गुण गाती नजर आएगी। मतगणना वाले दिन वैसा ही कुछ दिखाई भी दिया। न्यूज चैनलों का मुद्दा बदल चुका था, सभी चैनल चाहे हिंदी हों या अंग्रेजी सब ने अपना रुख कर्नाटक की ओर कर लिया। हालाकि इस बार चुनाव में क्या होने वाला है ये सबको चुनाव के पहले पता था। लेकिन चैनलों पर जोर-शोर से दावा किया जा रहा था कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। लेकिन ये कोई नहीं बता रहा था कि कांग्रेस किसे हराकर वहां सरकार बनाने जा रही है, क्योंकि बीजेपी ने तो पहले ही हथियार डाल दिए थे। वो पूरे मन से चुनाव लड़ ही नहीं रही थी। बीजेपी पहले से ये मानती रही है कि कर्नाटक में बी एस यदुरप्पा की वजह से चुनाव में जीत हुई थी, अब वो नहीं हैं तो पार्टी की वहां कोई संभावना नहीं है। बहरहाल कांग्रेस का गुणगान कर रहे चैनलों ने देश की 135 करोड़ आबादी को पूरी तरह छोड़ दिया, सिर्फ कर्नाटक की 6.12 करोड़ आबादी वाले राज्य की खबर पर जमकर बैठ गए। अच्छा यहां कि 80 फीसदी आबादी ना हिंदी जानती है और ना अंग्रेजी, वो कन्नड समझते हैं। लेकिन इससे मीडिया को भला क्या लेना देना। सच तो ये है कि जैसे मीडिया को पता था कि वहां कांग्रेस अच्छा करने जा रही है, वैसे जो लोग राजनीति की एबीसीडी भी जानते हैं, वो भी जानते थे कि यदुरप्पा के बगैर बीजेपी वहां शून्य है। सही मायने में तो कर्नाटक में हार यदुरप्पा की हुई है। उन्हें ही लग रहा था कि चोरी चकारी के आरोप लगने के बाद भी वो कर्नाटक में मजबूत है, लेकिन वहां की जनता ने उन्हें बता दिया कि अब वो उनके नेता नहीं रहे। लेकिन मीडिया को क्या कहा जाए ?  उस दिन उसके लिए रेलमंत्री पवन बंसल के भ्रष्टाचार का मामला कोई मुद्दा नहीं रहा, सीबीआई की जांच रिपोर्ट में हेराफेरी कराने वाले कानून मंत्री का मसला भी कोई मुद्दा नहीं रहा। पांच साल की बच्ची से बलात्कार के बाद सड़कों पर उतरी महिलाओं के साथ मारपीट का मसला भी कोई मुद्दा नहीं रह गया। तीनों गंभीर मामले में किसी को सजा नहीं मिल पाई है, लेकिन ये मुद्दे गायब हो गए।

बहरहाल प्रधानमंत्री जी अब बहुत ज्यादा हो गया। आपका, आपकी सरकार का और आपकी पार्टी का असली चेहरा जनता के बीच आ चुका है। आप देख रहे हैं ना कि कर्नाटक की जीत भी आपको इस मुश्किल से उबार नहीं पाई है। हालाकि देश का एजेंडा बदलने की कोशिश मीडिया ने की, लेकिन देखा कि जब तक दागी मंत्री सरकार में बने रहेंगे, देश की जनता कुछ और सुनने को तैयार नहीं है, लिहाजा सभी को उसी खबर पर वापस आना पड़ गया। वरना तो आप देखते कर्नाटक के एक से एक रंग आपको चैनलों पर दिखाई देते। अब आपको भी पता है कि कल तक तो सिर्फ बीजेपी कह रही थी कि आपकी सरकार आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार है, अब देश का बच्चा बच्चा कह रहा है कि ये सरकार भ्रष्ट है और आप वाकई कमजोर ही नहीं बीमार और अपंग प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं। अगर आप में थोड़ा भी स्वाभिमान बचा है तो प्लीज कुर्सी का मोह त्याग दीजिए और खुद अपनी सरकार का इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दीजिए। हो सकता है कि आपकी इस कार्रवाई से आपका पाप कुछ कम हो जाए।


Sunday, 7 April 2013

दलालों की दलाल हो गई है मीडिया !


मीडिया, नेता, उद्योगपति और नौकरशाह का गठजोड़ ना सिर्फ देश को कमजोर करने वाला है, बल्कि ये पूरे सिस्टम को खोखला भी कर रहा है। मेरा मानना है कि इन सब में सबसे अधिक जिम्मेदार मीडिया को होना चाहिए था, जबकि मीडिया ही आज सबसे अधिक विवादित हो गई है। हैरानी ये है कि तथाकथित " बड़े पत्रकार " अब पैसे के लिए इस हद तक गिर चुके हैं कि वो कारपोरेट दलालों की दलाली कर रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर मीडिया में शुचिता के लिए लड़ाई की शुरुआत कहां से होगी ? कहां से होगी ये तो एक सवाल है ही, सवाल ये भी है कि मीडिया में ईमानदारी की लड़ाई लड़ेगा कौन ? मुझे लगता है कि कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया के टेप में पत्रकारों का असली चेहरा दर्ज है, मेरी चिंता ये है कि आज नहीं कल जब भी ये टेप जनता के सामने आएगा, उस दिन मीडिया आखिर जनता को क्या जवाब देगी ? किस मुंह से पत्रकार जनता के सवालों का सामना करेंगे। आज नेताओं, नौकरशाहों को मीडिया सिर्फ  इसलिए कटघरे में खड़ा कर लेती है, क्योंकि अभी उसका चेहरा सामने आया नहीं है, लेकिन ये अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं है। देख रहा हूं कि नेता और अफसर तो मीडिया से घबराए रहते हैं, क्योंकि चोरी का पैसा ठिकाने लगाने का उनके पास बहुत सीमित रास्ता है, जबकि उद्योगपति अब आंख तरेरने लगे हैं।

हर मामले में मीडिया नेताओं से जवाब मांगने के लिए गला फाड़-फाड़ कर चीखती है। मेरा एक सवाल है। मैं देख रहा हूं कि नीरा राडिया के टेप को लेकर पूरी मीडिया कटघरे में है। संदेश ऐसा जा रहा है जैसे दिल्ली की पूरी मीडिया नीरा राडिया की उंगली पर नाच रही थी। ये बात मीडिया के लोग भी जानते हैं कि नीरा राडिया ने किसे-किसे फायदा पहुंचाया है। लेकिन कटघरे में देश की पूरी मीडिया है। आखिर मैं आज तक नहीं समझ पा रहा हूं कि जो मीडिया संस्थान साफ सुथरे हैं उन्हें असलियत उजागर करने में क्या दिक्कत है? वो तो पूरी सच्चाई ईमानदारी से सही बात सामने रख सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है, यही वजह है कि नीरा राडिया और मीडिया को लेकर तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ दिन पहले एक नई बात सामने आई है। कहा जा रहा है कि नीरा राडिया ने प्रवर्तन निदेशालय के सामने पूछताछ के दौरान कई ऐसे खुलासे किए हैं, जिससे मीडिया कटघरे में है। मसलन अपने कारपोरेट क्लाइंट्स के पक्ष में लाबिंग के लिए मीडिया पर उसने करीब 160 करोड़ रुपये खर्च किए। ये रकम छोटी मोटी नहीं है। इतना ही नहीं उसने करोड़ों रुपये का एक फ्लैट विदेश में खरीदकर एक न्यूज चैनल की महिला जर्नलिस्ट को गिफ्ट किया। अगर ये अफवाह है तो इसका सख्ती से खंडन होना चाहिए, अगर इसमें एक प्रतिशत भी सच्चाई है तो इस बात का पूरा खुलासा होना ही चाहिए।

सबको पता है कि पिछले दिनों एक बात सामने आई कि कुछ पत्रकार केंद्र की सरकार में दक्षिण की  एक खास पार्टी के पक्ष में लाबिंग कर रहे थे, जिससे टेलीकम्यूनिकेशन मंत्रालय का मंत्री उसी खास को बनाया जाए, जिससे वो राजा की तरह राज कर सके। अब ये क्या है ? आखिर ऐसी लाबिंग के मायने क्या हैं ? नीरा राडिया ने करोड़ो रुपये एक राष्ट्रीय अखबार के बड़े पत्रकार को भी दिए, जिसेक एवज में उस पत्रकार ने काफी सूचनाएं राडिया को मुहैया कराई। अगर ऐसा है तो ये वाकई गंभीर मामला है, इसका खुलासा क्यों नहीं होना चाहिए ? बहरहाल मैं जानता हूं कि मीडिया अपने भीतर झांकने को कत्तई तैयार नहीं है। इसलिए नीरा राड़िया के मामले में जो जानकारी सामने आए, उसे भले भी विज्ञापन के तौर पर ही क्यों ना छपवाना पड़े, सब आम जनता तक पहुंचनी चाहिए। जिससे पता चले कि आखिर मीडिया की आड़ में कुछ लोग कैसा गोरखधंधा कर रहे हैं। वैसे मुझे नहीं लगता कि मीडिया नीरा राडिया या कुछ पत्रकारों को बचाने के लिए खामोश है। अंदर की बात तो ये है कि नीरा राड़िया जिन लोगों के लिए काम कर रही थी, वो चेहरे कहीं सामने ना आ जाएं, इसलिए ये मीडिया बापू की बंदर बनी हुई है। कुछ भी हो, लेकिन ये कोशिश सरकार को करनी ही होगी कि राडिया के मामले में सही सही जानकारी देश को पता चले।

सच बताऊं अंदर की खबर तो ये भी है कि बीजेपी ने भले ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी की ओर से पीए पद का उम्मीदवार घोषित ना किया हो, लेकिन उद्योगपतियों ने उन्हें पीएम का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। यही वजह है कि पूरी मीडिया नरेन्द्र मोदी के गुणगान करती दिखाई दे रही है। सच्चाई क्या है ये तो उद्योगपति जानें, लेकिन सियासी गलियारे में चर्चा तो यही है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को  सीआईआई में इसीलिए बुलाया गया था कि उसके कुछ दिन बाद फिक्की के कार्यक्रम में मोदी को बुलाया जाए, जिससे मोदी अपने तीखे और असरदार भाषण से उद्योगपतियों पर अपनी छाप छोड़ सकें और राहुल के भाषण और उनकी सोच को फीका कर दें। मुझे लगता है कि इसमें कुछ हद तक कारपोरेट जगत को कामयाबी भी मिली है। बताया जा रहा है कि देश का उद्योग जगत मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में देखना चाहता है, उसे लगता है कि मोदी उनकी उम्मीदों पर खरे उतर सकते हैं। आज नहीं तो कुछ दिन बाद ही सही ये मामला भी सामने आ ही जाएगा।

अगर मैं ये कहूं कि सिर्फ दिल्ली की मीडिया ही लाबिंग करती है तो ये कहना गलत होगा। मेरा एक सवाल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह से भी है। पता चला है कि इन दोनों राज्यों के तमाम नामचीन पत्रकार अपनी पत्नी और परिवार के किसी और सदस्य के नाम बेवसाइट का संचालन कर रहे हैं। ऐसे ब्लाग जिनकी रीडरशिप भी कोई खास नहीं है, लेकिन उन्हें हर महीने एक अच्छी खासी रकम का भुगतान किया जा रहा है। कहने को तो ये विज्ञापन है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इसमे ज्यादातर उन्हीं पत्रकारों का परिवार शामिल क्यों है जो देश के बड़े मीडिया हाऊस या फिर बड़े अखबार समूह से जुडे हुए हैं ? इसकी पूरी छानबीन जरूरी है, जिससे पता चले की बेईमानी का मकड़जाल महज दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि ये राज्य और जिला स्तर तक पहुंच चुका है। हो सकता है कि ये बात सच ना हो, लेकिन इसमें थोड़ी भी सच्चाई है तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं की देश की मीडिया का पतन किस स्तर तक हो चुका है।

मैं देख रहा हूं कि अगर इस बुराई के मामले में कोई संस्था प्रभावी कदम उठा सकती है तो वह है प्रेस काउंसिल आफ इंडिया। लेकिन पीसीआई के चेयरमैन की प्राथमिकता में ही ये काम नहीं है। प्रेस परिषद के चेयरमैन मार्कडेय काटजू इन सभी मामलों में अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन वो तो कभी देश की जनता को गरियाते दिखाई दे रहे हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट से सजा पाए फिल्मी कलाकार को सजा से छूट दिलाने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं। मीडिया की बुराइयों की अनदेखी करते हुए उन्हें ये ज्यादा महत्वपूर्ण लग रहा है कि पत्रकार बनने की योग्यता तय कर दी जाए। काटजू साहब मैं बहुत ही भरोसे के साथ कह सकता हूं कि झोला छाप डाक्टर भले ही आम आदमी के लिए खतरनाक हो, लेकिन झोला छाप पत्रकार आम आदमी की दिक्कतों को ना सिर्फ समझता है बल्कि उसे सही मायने में महसूस भी करता है। इसलिए आप अपनी ऊर्जा को सही जगह इस्तेमाल करें तो शायद मीडिया में जहर की तरह घुल रही बेईमानी की बीमारी का सही इलाज हो सके।